Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 17
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

ाप केन्द्रद्िकोण शुभः यमभे पूर्वाद्दीशकृशानुस षघट्त्त्यायेष्वशुभविना घटतनुं सन्विक्रयः सत्तिथो । रिक्ताभौसमघटान्विना च विपणिमभित्र ध्रुवक्षिप्रभलंग्ने चन्द्रसिते व्ययाष्टरहिते: पापः शुभदर्चायखे ॥ १७१४ अन्वयः--पूर्वाद्दीशकृशानूसापंयमभे शुभेः केन्द्रत्निकोणे, अशुभ: षट्ज्यायेषु (स्तिथैः) घटतन्‌, विना, सत्तिथौ विक्रथ: सत्‌, रिक्ताभौमघटान्‌ विना, च मित्र ध्रुवक्षिप्रभेः चन्द्रसिते लग्ने, पापैः व्ययाष्टरहिते:, शुभे: दय्यायखे, विपणि: सत्‌ ॥ १७॥। तीनों पूर्वा, विशाखा, कृत्तिका, आइ्लेषा और भरणी नक्षत्र में लग्न से पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, दूसरे, पाँचेवें और नवें स्थान में शुभग्रह हों, छठें, तीसरे, गेरहवें स्थान में अशुभ ग्रह हों ऐसे लग्न में, कुंभ को छोड़ अन्य लग्गों में और शुभ तिथियों में किसी वस्तु का बेचना शुभ होता है। चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तस, अश्विनी, पुष्य, हस्त, इन नक्षत्रों में, चौथि, नवमी, चतुर्दशी, मज्भुल दिन, कुम्भ लग्न को. छोड़ अन्य तिथि, दिन और लग्नों में, चन्द्रमा और शुक्र के लग्न में रहते, बारहवें आठवें स्थान में पापग्रहों केन रहते, दूसरे, गेरहवें, दशवें स्थान में शुभग्रहों के रहते बाजार का काये (बेचना, मोल लेना इत्यादि) शुभ है ॥ १७॥

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse