Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 13
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

राधामूलमृदु भ्रुवक्षंवरुणक्षिप्रलंतापादपारोपोष्थयो नृपदर्शनं प्रवमृदुक्षिप्रश्रवोवासव: । तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यमुदितं क्षिप्रान्त्यवह्नीन्द्र भादिव्येन्द्राम्बुपवासवेषु हि गवां दस्त: क्यो विक्रेयः ॥| १३॥ अन्बयः--राधामूलमृदु ध्रुवक्षेवरुण क्षिप्रे:लतापादपांरोप:, अथ प्रृवमृदृक्षिप्रश्नवोवासवे: नृपदर्शनं, तीक्षणोग्रांबुपभेषु मद्यं उदितम्‌, क्षिप्रांत्यवह्लीन्दुभादित्येन्द्राम्बूपवासवेष गवां क्रयो विक्रय: शस्तो हि ॥ १३ ॥। विशाखा, मूल, मृदुसंज्ञक अर्थात्‌ चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, प्रुवसंज्ञक अर्थात्‌ तीनों उत्तरा, रोहिणी, शतभिषा और क्षिप्रसंज्ञक अर्थात्‌ अधश्विनी, पुष्य, हस्त इन चौदह नक्षत्रों मेंलता और वृक्ष लगाना चाहिए। भ्रवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक, श्रवण, धनिष्ठा इन तेरह नक्षत्रों में राजा का दर्शन करना चाहिए। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, मघा, भरणी, शतभिषा, इन नक्षत्रों में मद्यारम्भ शुभ कहा गया है । अधश्विनी, पुष्य, हस्त, रेवती, विशाखा, पुनवेसु, ज्येष्ठा, शतभिषा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों में गो-बेल आदि का मोल लेना और बेचना शुभ है ॥ १३॥।

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