Vivāha Vṛndāvana
Chapter 17 · Lagna Shuddhi Prakarana (Purification of the Ascendant) · Verse 3
Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
Translations
Hindi

वैधृति, साध्य, हर्षण, गण्ड, शूल, और व्यतिपात इन योगों के अन्त में जो नक्षत्र हो, क्रान्तिसाम्य जिस नक्षत्र में हो और वेध सहित जो नक्षत्र हो ये शुभ नहीं हैं। अब वेध को कहते हैं — स्वाती और शतभिषा में, श्रवण और मघा में, भरणी अनुराधा में, अभिजित् रोहिणी में, पुनर्वसु मूल में परस्पर वेध होता है। तथा रेवती उत्तरफाल्गुनी में, मृगशिरा उत्तराषाढा में, और हस्त उत्तरभाद्रपदा में परस्पर वेध होता है। अर्थात् एक में ग्रह हो तो दूसरा विद्ध समझा जाता है ॥ ३ ॥

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse