HomeLibrarySaravaliCh.9Verse 18
Sārāvalī
Chapter 9 · Conditions at Birth · सूतिकाव्यायो नवमः ॥ दशमा · Verse 18
Sanskrit · DevanāgarīSārāvalī manuscript tradition
सुतिका की शय्या का ज्ञान
'खट्वास्थितिर्भवनवद्युतविहगसमानि तत्र चिह्नानि।
आस्तरणानि च विद्यात्‌ दृष्टिशुभकृतानि देवज्ञः
प्राच्यादिगृहद्वितयं द्विशरीरा राशयश्च गात्राणि।
आजानुशिरःशयनं ग्नहतुल्यं लक्षणं तत्र
ग्रहयुक्तं वा नियतं विनतत्वं च द्विमृतिराशिषु च।
षट्त्रिनवान्त्याः पादाः “पर्यङ्के ऽङ्गानि राशयः शेषाः
Translations
English

Now explained is the situation of the cot, on which the delivery took place. The 3rd, 6th, 9th and 12th indicate the four legs of cot. The first two relate to southern side legs and the other two denote the northern side legs. If the Ascendant is aspected by a benefic, the kind of cloth relating to that benefic was spread on the delivery cot. The Ascendant leads to know the direction, in which the mother was having her head. The depression in the cot corresponds to the Common Sign occupied by malefics.

Hindi

सूतिका की शय्या का ज्ञान घर की तरह करना चाहिये । शय्या के जिस भाग में ग्रह जिस स्थिति में हों उसी प्रकार से वहाँ चिन्हों को कहना, तथा विस्तर का ज्ञान लग्न पर शुभ ग्रह की दृष्टि से दैवज्ञ ( योतिषी) को जानना चाहिये । पूर्वादि दिशाओं में दो दो राशि एव द्विस्वभाव राशियों (३।६।९।१२) को कोण में (पायों पर) न्यास करने से शय्या का स्वरूप होता है, अर्थात्‌ शय्या में १२ भावों का न्यास इस प्रकार से करना चाहिये-लग्न व द्वितीय भाव को सिर की ओर, तृतीय भाव को सिर के दक्षिण पावा पर, ४, ५वाँ दक्षिण पाटी पर, षष्ठ भाव को पैर के दक्षिण पावा पर, ७, ८वाँ भाव पैर की पाटी पर, ९वाँ भाव पेर के वाम भाग के पावा पर, १०, १{वाँ भाव, वाम पाटी पर और वारहवें भाग को सिर के वाम भाग के पावा पर न्यास करने से पाय से सिर तक शय्या की स्थिति होती है । ग्रह के समान शय्या के लक्षण कहना चाहिये । द्विस्वभाव राशि जिस अंग (शय्या के) में ग्रह युक्त हो वहाँ पर शय्या में टेढापन समझना । पाप ग्रह से उस अंग में आघात कहना । ६, ३, ९, १२ राशि भाव शय्या में पावा होती हैं और अन्य राशि शय्या के अंग होते हैं

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