The Sapthamsas or the 1/7th portions are in the case of an odd sign to be counted regularly from the sign itself, while in the case of an even sign they are to be reckoned from the 7th onwards. In the case of an odd sign, the Dasamamsas or 1/10th portions are to be counted from the sign itself; in the case of an even sign, from its 9th onwards. The lords of the Shodasamsas or the 1/16th sub-divisions in the case of an odd sign are those of the 12 signs reckoned from that sign onward and Brahma, Vishnu, Hara and Ravi. In the case of an even sign, this is reversed. The renowned or auspicious parts of great excellence arise from the several Vargas (Rasi, Hora, Drekkana, etc.) by the combination (of the special characteristics) of Trikona, Moolatrikonabhavana, Swakshetra, Swochcha, Kendra and Vargottama, and number 7 in the case of the Saptha Vargas and 10 in the Dasa Vargas. Others reckon them as 13.
प्रथम अध्याय में विविध भावों का परिचय कराया; द्वितीय अध्याय में ग्रहों का परिचय दिया और अब तृतीय अध्याय में वर्गों का परिचय देते हैं। वर्ग का अर्थ है हिस्से। यदि सम्पूर्ण राशि को एक माना जाय और उसके दो हिस्से किये जायें तो प्रत्येक आधा हिस्सा होरा कहलाता है। यदि राशि के तीन बराबर हिस्से किये जायें तो प्रत्येक भाग द्रेष्काण कहलाता है। इसी प्रकार पाँच हिस्से, सात हिस्से, दस हिस्से, बारह भाग, सोलह भाग — साठ भाग तक करने से जो विभाग उपस्थित होते हैं उन्हें वर्ग कहते हैं। दश वर्गों की तालिका — (१) १ भाग — राशि प्रत्येक — ३०° का (२) दो भाग — होरा — १५ अंश का (३) तीन भाग — द्रेष्काण — १० अंश का (४) पाँच भाग — त्रिंशांश — ५, ७ या ८ अंश का (५) सात भाग — सप्तमांश — ४°—१७'—८" अंश का (६) नौ भाग — नवांश — प्रत्येक ३°—२०" अंश का (७) दस भाग — दशमांश — ३ अंश का (८) बारह भाग — द्वादशांश — २°—३०' अंश का (९) षोडश भाग — षोडशांश — १°—५२'—३०" अंश का (१०) साठ भाग — षष्ट्यंश — ३० कला का इन दस वर्गों में से जब केवल राशि, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश का विचार किया जाता है तो इसे षड्वर्ग कहते हैं। यदि षड्वर्ग के साथ सप्तमांश का भी विचार किया जावे तो इसे सप्तवर्ग विचार कहते हैं। यदि ऊपर जो दस वर्ग दिये गये हैं सब का विचार किया जाय तो इसे दशवर्ग विचार कहते हैं। नोट — कोई भाग पाँच अंश का, कोई सात का, कोई आठ का होता है; सब त्रिंशांश बराबर नहीं होते। [OCR तालिका अपठनीय — होरा चक्र, द्रेष्काण चक्र, सप्तमांश चक्र, दशमांश चक्र, नवांश चक्र, द्वादशांश चक्र, षोडशांश चक्र और त्रिंशांश चक्र मूल पाठ में सम्मिलित हैं।] यदि तीस अंशों को ७ से भाग दिया जावे तो ४ अंश १७ कला ८ विकला आदि आता है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से ४—१७—८ लिखा है। विकला के भाग छोड़ दिये हैं क्योंकि स्पष्ट ग्रह विकला तक ही किये जाते हैं। पराशर होरा में इन सात भागों को क्रमशः (१) क्षार (२) क्षीर (३) दधि (४) आज्य (५) इक्षुरस (६) मद्य (७) शुद्ध जल कहा गया है। षोडशांश के अधिपति — मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ इन छः विषम राशियों में सोलह भागों के स्वामी (१) ब्रह्मा, (२) विष्णु, (३) हर, (४) सूर्य, (५) ब्रह्मा, (६) विष्णु, (७) हर, (८) सूर्य, (९) ब्रह्मा, (१०) विष्णु, (११) हर, (१२) सूर्य, (१३) ब्रह्मा, (१४) विष्णु, (१५) हर, (१६) सूर्य होते हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन इन छः सम राशियों में १६ भागों के स्वामी (१) सूर्य, (२) हर, (३) विष्णु, (४) ब्रह्मा, (५) सूर्य, (६) हर, (७) विष्णु, (८) ब्रह्मा, (९) सूर्य, (१०) हर, (११) विष्णु, (१२) ब्रह्मा, (१३) सूर्य, (१४) हर, (१५) विष्णु, (१६) ब्रह्मा होते हैं। त्रिंशांश का अर्थ है तीस भाग, किन्तु प्रचलित प्रथा यह है कि एक राशि के पाँच हिस्से करते हैं। विषम राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ) में प्रथम भाग ५ अंश तक, दूसरा १० अंश तक, तीसरा १८ अंश तक, चौथा २५ अंश तक, पाँचवाँ ३० अंश तक होता है। सम राशियों (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) में प्रथम विभाग ५ अंश तक, दूसरा १२ अंश तक, तीसरा २० अंश तक, चौथा २५ अंश तक, पाँचवाँ ३० अंश तक होता है। षष्ट्यंश — प्रत्येक राशि में तीस अंश होते हैं; प्रत्येक अंश को यदि दो में विभाजित किया जाय तो आधे-आधे अंश के — ६० भाग — प्रत्येक राशि के किये जा सकते हैं। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियों में १, २, ८, ९, १०, ११, १२, १५, १६, ३०, ३१, ३२, ३३, ३४, ३५, ३९, ४०, ४२, ४३, ४४, ४८, ५१, ५२ और ५९वें भाग क्रूर हैं। शेष भाग सौम्य हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में ३, ४, ५, ६, ७, १३, १४, १७, १८, १९, २०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३६, ३७, ३८, ४१, ४५, ४६, ४७, ४९, ५०, ५३, ५४, ५५, ५६, ५७, और ६० वाँ भाग क्रूर हैं, बाकी सौम्य। यह दश वर्ग हुए। किसी भी ग्रह की शुभता या क्रूरता का विचार करना हो तो यह देखिये कि वह अपने उच्च अथवा स्वयं की या मित्र आदि की राशि होरा द्रेष्काण आदि में है या शत्रु अधिशत्रु के घर और वर्गों में पड़ा है। परन्तु सब वर्गों का समान महत्त्व नहीं है। यदि राशि को सोलह आने महत्त्व दिया जावे तो और वर्गों को — होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश को आठ आना महत्त्व देना चाहिये। किसी-किसी का मत यह है कि नवांश को भी सोलह आने महत्त्व दिया जाना चाहिये। बाकी के तीन वर्ग दशमांश, षोडशांश और षष्ट्यंश को रुपये में चार आना महत्त्व देना चाहिये। हमारा विचार यह है कि राशि और नवांश को करीब-करीब बराबर सा महत्त्व देना उचित है। यदि राशि शरीर है तो नवांश दिल है; शरीर कमज़ोर हो, दिल मज़बूत हो तो मनुष्य दीर्घायु तक जीवित रहता है किन्तु शरीर बलवान हो और दिल कमज़ोर हो तो हार्ट फेल होने में देर नहीं लगती। यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवांश में हो तो उसे वर्गोत्तम कहते हैं। उदाहरण के लिये चन्द्रमा के मेष राशि में दो अंश हों तो चन्द्रमा मेष राशि और मेष ही नवांश में होने के कारण वर्गोत्तम में हुआ। वर्गोत्तम ग्रह ऐसा ही बलवान समझा जाता है जैसा स्वराशि में। इसके अतिरिक्त ग्रहों की एक संज्ञा और बतायी है वह है बाल, कुमार, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियों में ६° तक बाल, १२° तक कुमार, १८° तक युवा, २४° तक प्रौढ़ और अन्तिम ६° में ग्रह मृत समझा जाता है। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में उल्टा क्रम है — ६° तक मृत, १२° तक प्रौढ़, १८° तक युवा, २४° तक कुमार, और अन्तिम ६° तक बाल समझा जाता है। किसी ग्रह के बलाबल का विचार करना हो तो देखिये कि वह ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में है, अपनी राशि, मूल त्रिकोण राशि, उच्च राशि या वर्गोत्तम में है क्या? इसके बाद सप्तवर्ग या दशवर्ग में विचार कीजिये। बहुत से लोग केवल दशवर्गों में देखते हैं और मित्रगृही है, स्वराशि में है या उच्च राशि में — इन सब बातों के लिये तेरह वर्गों का विचार करते हैं।
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