A planet is blazing (Pradeepta) when he is in his exaltation; he is happy (Sukhita) in his Moolatrikona; he is confident (Swastha) in his own house; he is delighted (Mudita) in a friend's house; calm (Shanta) when he has reached the Varga of a benefic planet. He is capable (Shakta) when he shines bright with unclouded splendour.
अपनी उच्च राशि में ग्रह प्रदीप्त कहलाता है। अपनी मूलत्रिकोण राशि में इसे सुखित कहते हैं। अपनी स्वराशि में ग्रह स्वस्थ कहलाता है। मित्र के घर में मुदित। सौम्य ग्रह के वर्ग में हो और सौम्य ग्रह से युक्त हो तो ग्रह को शान्त कहते हैं। जब किसी ग्रह का प्रकाश मण्डल पृथ्वी से दिखाई दे (अर्थात् सूर्य के समीप रहने के कारण ग्रह अस्त न हो) तो ऐसा ग्रह शक्त कहलाता है, अर्थात् शुभ प्रभाव दिखाने की ताकत उसमें होती है। अस्त ग्रह बहुत निकृष्ट फल दिखाता है; इतना कमज़ोर रहता है कि वह कुछ भलाई करने के काबिल ही नहीं रहता। अस्त ग्रह को विकल भी कहते हैं — अर्थात् यदि अस्त न हो तो शक्त, यदि अस्त हो तो विकल। जो ग्रह युद्ध में दूसरे ग्रह से 'हारा' हुआ हो उसे निपीड़ित कहते हैं। जो पाप ग्रह या ग्रहों के वर्ग में हो उसे खल कहते हैं। जो शत्रु गृह में हो उसे पूर्ण दुखी, और जो अपनी नीच राशि में हो उसे अतिभीत कहते हैं। प्रायः जैसा कि प्रदीप्त, सुखित, स्वस्थ, मुदित, शान्त, शक्त, निपीड़ित, खल, सुदुःखित, नीच और विकल — यह जो ११ अवस्थायें बतायी गई हैं — इनमें नाम के अनुसार ही फल समझना चाहिये। प्रथम ६ अवस्थाओं में ग्रह शुभ फल देता है। उच्च में १६ आना शुभ; सुखित में १४ आना; स्वराशि में १२ आना; मित्र राशि में १० आना; शान्त अवस्था में ८ आना; और शक्त अवस्था में ६ आना शुभ। निपीड़ित अवस्था में ६ आना अशुभ; खल अवस्था में ८ आना अशुभ फल; सुदुःखित अवस्था में १० आना अशुभ फल; नीच राशि में १२ आना अशुभ फल; और विकल अवस्था में १६ आना अर्थात् पूर्ण अशुभ फल समझना चाहिये। अच्छी अवस्था वाले ग्रह की दशा अन्तर्दशा में शुभ परिणाम होंगे। निकृष्ट अवस्था वाले ग्रह की दशा अन्तर्दशा में अशुभ फल होगा। (टिप्पणी — ग्रह-युद्ध — जब दो ग्रह एक ही राशि, अंश, कला में हों तो वे परस्पर युद्ध में हैं — ऐसा समझा जाता है। दोनों ग्रहों का स्थानबल, दिक्बल और कालबल निकालना चाहिये। षड्बल छः प्रकार के बलों के योग को कहते हैं — (१) स्थानबल (२) कालबल (३) दिक्बल (४) अयनबल (५) चेष्टाबल (६) नैसर्गिक बल; परन्तु युद्ध-निर्णय के लिये (१), (२), (३) का योग करते हैं। जो दो ग्रह युद्ध में हों उनके बलों को देखिये — अधिक बल में से कम को घटाइये। जो बचे उसे उन दोनों के बिम्ब परिमाण के अन्तर से भाग दीजिये। जो भजन फल आवे — उसे उस ग्रह के बल में जोड़िये जो उत्तर हो और उस ग्रह के बल में से घटाइये जो दक्षिण हो। जो ग्रह उत्तर को है वह जीता हुआ और जो दक्षिण को है वह हारा हुआ समझा जाता है। बिम्ब परिमाण — मंगल ९.४ विकला, बुध ६.६ विकला, बृहस्पति १९.४ विकला, शुक्र १६.६ विकला, शनि १५.८ विकला।)
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