HomeLibraryPhaladeepikaCh.21Verse 84
Phaladeepika
Chapter 21 · pratyantardaśāphala · प्रत्यन्तर्दशाफल · Verse 84
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
दशापहारेषु फलं यदुक्तं
वर्णाधिकारानुगुणं वदन्तु ।
छिद्रेषु सूक्ष्मेष्वपि तत्फलाप्तिः
छायाङ्कवार्तश्रवणानि वा स्युः
IAST Transliteration
daśāpahāreṣu phalaṃ yaduktaṃ varṇādhikārānuguṇaṃ vadantu | chidreṣu sūkṣmeṣvapi tatphalāptiḥ chāyāṅkavārtaśravaṇāni vā syuḥ
TranslationsTwo-source verified
English

What has been stated as the effect in each of the Bhuktis of a Dasa should be so declared as to suitably fit in with the person's caste, status, occupation, etc. In a similar way should results be attempted for each Antara or Antarantara; or, the effects may also be foretold after guessing correctly the particular Dasa then ruling by means of the characteristics revealed (exhibited) at the time in the native's person by the elements (Panchabhutas — Fire, Air, Ether, Water and Earth) through Eyes, Touch, Ears, Face and Nose; or by hearing the words emanating at the time.

Hindi

ऊपर जो दशा-अन्तर्दशा का फल कहा गया है, वह जातक की परिस्थिति — वह किस जाति का है, किस पद पर है, क्या कार्य करता है — इन सब बातों का विचार कर कहना चाहिये। ऊपर के श्लोकों में केवल महादशा और अन्तर्दशा का फल बताया गया है। इन्हीं सिद्धान्तों को लागू कर प्रत्यन्तर्दशा आदि का फल भी कहना चाहिये अर्थात् 'क' ग्रह की महादशा में 'ख' ग्रह की जो अन्तर्दशा का फल है वही 'क' ग्रह की अन्तर्दशा में 'ख' ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा का फल होगा। इसी प्रकार तारतम्य कर प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्म दशा आदि का फल कहें। वराहमिहिर ने लिखा है कि जिस ग्रह की महादशा होती है उस ग्रह की छाया मनुष्य पर विद्यमान होती है और उस मनुष्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है। सूर्य और मंगल का अग्नि-तत्व है। चन्द्रमा और शुक्र का जल-तत्व, बुध का पृथ्वी-तत्व, बृहस्पति का आकाश-तत्व और शनि का वायु-तत्व। द्वितीय अध्याय में ग्रहों के पृथक्-पृथक् गुण दिये हैं। जिस ग्रह की महादशा होती है उसके लक्षण जातक में विशेष रहते हैं, उसकी आकृति और वचन भी ग्रह के प्रभाव अनुसार होते हैं। इन सब बातों से भी यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि जातक पर किस प्रकार का प्रभाव चल रहा है और तदनुसार ऊहापोह कर फल कहना चाहिये। जिसकी जन्म-कुंडली न हो उसके शरीर की कान्ति, छाया, उसकी चेष्टा, वाणी, क्रिया, व्यवहार आदि से यह पता लगाने की कोशिश करनी चाहिये कि किस ग्रह की महादशा, किसकी अन्तर्दशा, किसकी प्रत्यन्तर्दशा है। किन्तु जिसकी शुद्ध कुंडली सामने हो — उसमें अनुमान की अपेक्षा नहीं है।

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