The initial Mahadasa of a life belongs to the lord of the Rasi owning the Nakshatra Pada occupied by the Moon at the time of birth, being so much of the Rasi-Mahadasa as corresponds to the Ghatikas that yet remain of the Nakshatra pada, and the order of Mahadasas follows the natural order of the Nakshatra padas reckoned from the aforesaid one. This is the opinion, say the sages, held by some astrologers.
भुक्त-भोग्य दशा निकालने का प्रकार बताते हैं। नक्षत्र चरण के जितने घड़ी-पल बीत गये हैं और नक्षत्र चरण के जितने घड़ी-पल बाकी हैं (यहाँ पूरे नक्षत्र का मान नहीं लिया जाता है — परन्तु नक्षत्र मान का चौथाई लिया जाता है, क्योंकि नक्षत्र के चार चरण होते हैं — चारों चरण बराबर होते हैं) उसी अनुपात से भुक्त-भोग्य निकलेगा। उस राशि का — जो राशियाँ उस चरण के लिए बताई गई हैं उनमें से जो सर्वप्रथम हो (उदाहरण के लिये मृगशिर चतुर्थ चरण के लिये बताई राशियों में सर्वप्रथम धनु-बृहस्पति है) — उसके जितने वर्ष हों उनको जितने घड़ी-पल नक्षत्र चरण के शेष हों उनसे गुणा करना और नक्षत्र चरण मान से भाग देना — तो भोग्य दशा निकल आवेगी। और बाद की दशा उस नक्षत्र चरण के लिये जिन राशियों की दशा बताई गई हैं उस क्रम से होगी — ऐसा कुछ विद्वानों का मत है।
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