Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
कालस्तु राहुर्गुलिकस्तु मृत्यु\-
र्जीवातुकः स्याद्यमकण्टकोऽपि ।
अर्द्धप्रहारः शुभदः शुभाङ्क\-
युक्तोऽन्यथा चेदशुभं विदध्यात्
IAST Transliteration
kālastu rāhurgulikastu mṛtyu\-
rjīvātukaḥ syādyamakaṇṭako'pi |
arddhaprahāraḥ śubhadaḥ śubhāṅka\-
yukto'nyathā cedaśubhaṃ vidadhyāt
TranslationsTwo-source verified
Hindi
काल का प्रभाव राहु के सदृश होता है — अर्थात् यदि किसी भाव में काल हो तो वही फल कहना जो उस भाव में यदि राहु रहता तो कहते। गुलिक साक्षात् 'मृत्यु' है। यमकण्टक में बृहस्पति की भाँति जीवन-प्रदायिनी शक्ति है। जिस भाव में अधिक शुभ बिन्दु हों — उसमें यदि अर्द्धप्रहार बैठे तो शुभ फल प्रदान करता है। यदि अर्द्धप्रहार ऐसे घर में बैठे जिसमें सर्वाष्टकवर्ग में अधिक शुभ बिन्दु न हों — तो अर्द्धप्रहार शुभ फल नहीं करेगा।
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