HomeLibraryPhaladeepikaCh.25Verse 17
Phaladeepika
Chapter 25 · gulikādi upagraha · गुलिकादि उपग्रह · Verse 17
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
विषरोगी राहुयुते शिखियुक्ते वह्निपीदितो मान्दौ ।
गुलिकस्त्याज्ययुतश्वेत्तस्मिञ्जातो नृपोऽपि भिक्षाशी
IAST Transliteration
viṣarogī rāhuyute śikhiyukte vahnipīdito māndau | gulikastyājyayutaśvettasmiñjāto nṛpo'pi bhikṣāśī
TranslationsTwo-source verified
Hindi

यदि राहु और गुलिक एक साथ हों तो जातक विष-रोगी होता है (किसी प्रकार के विष के शरीर में उत्पन्न होने से जो रोग होते हैं)। यदि केतु और गुलिक एक साथ हों तो जातक अग्नि से पीड़ित होता है। यदि जिस दिन जातक का जन्म हुआ है उस दिन गुलिक त्याज्य-काल में पड़े तो ऐसा जातक चाहे राजघराने में भी पैदा हुआ हो — किन्तु भीख माँगता है (दरिद्र होता है)। (त्याज्य-काल: विषघटी, व्यतीपात तथा वैधृति योग, भद्रा करण, क्षय तिथि, वृद्धि तिथि, कुलिक एवं अर्धयाम, पात-योग, विष्कुम्भ एवं वज्र, परिघ-योग का पूर्वार्ध, गण्ड-योग में ६ घड़ी, व्याघात में ९ घड़ी — परन्तु इस प्रकरण में नक्षत्र-घटी का त्याज्य-काल लागू करना चाहिये।)

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