Just as what has been said about the mother from the 4th Bhava, similar remarks should be made in the case of the father, brothers and sons from a reference to the respective Bhavas, Karakas of the Bhavas concerned, the planet owning the Bhava, the Lagna and its lord.
जिस तरह चतुर्थ भाव तथा मातृ-कारक चन्द्रमा से मातृ भाव का विचार किया गया है उसी प्रकार पिता, भाई, पुत्र आदि का (भाव, कारक-ग्रह, भावेश, ग्रहों का लग्न और लग्नेश से कैसा सम्बन्ध है यह विचार कर) फल कहना चाहिये। उदाहरण के लिये लग्न, लग्नेश बलवान हों — पंचम भाव, पंचम भाव का स्वामी और पुत्र-कारक बृहस्पति — इन सब में मित्रता हो तो पुत्र से प्रेम और पुत्र-सुख होगा। लग्नेश और पंचमेश एक दूसरे के शत्रु हों, परस्पर छठे आठवें हों, एक दूसरे की शत्रु या नीच राशि में हों तो पिता-पुत्र में प्रेम नहीं रहेगा।
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