HomeLibraryPhaladeepikaCh.6Verse 8
Phaladeepika
Chapter 6 · yogādhyāya · योगाध्याय · Verse 8
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
हित्वेन्दुं शुभशुभसिवेवास्युभयचर्याख्याः स्वरिःफोभय\-
स्थानस्थैः सवितुः शुभैः स्युरशुभैस्ते पपसंज्ञाः स्मृताः ।
सत्पार्श्वे शुभकर्तरीत्युदयभे पापेस्तु पापाह्वयो
लग्नाद्वित्तगतैः शुभैस्तु सुशुभो योगो न पापेक्षितैः
IAST Transliteration
hitvenduṃ śubhaśubhasivevāsyubhayacaryākhyāḥ svariḥphobhaya\- sthānasthaiḥ savituḥ śubhaiḥ syuraśubhaiste papasaṃjñāḥ smṛtāḥ | satpārśve śubhakartarītyudayabhe pāpestu pāpāhvayo lagnādvittagataiḥ śubhaistu suśubho yogo na pāpekṣitaiḥ
TranslationsTwo-source verified
English

If benefic planets other than the Moon occupy the 2nd, 12th and both the Bhavas from the Sun, the resulting Yogas are respectively termed Subhavesi, Subhavasi, and Subhobhayachari. But if the planets in question be malefic, the concerned Yogas are called Papavesi, etc. When the 12th and the 2nd Bhavas from the Lagna are occupied by benefics, the Yoga is Subhakartari. It is called Papakartari, when the above two houses are occupied by malefics. If benefics unaspected by malefics, occupy the 2nd house from the Lagna, the Yoga is termed Susubha.

Hindi

ऊपर के श्लोकों में सूर्य के अतिरिक्त कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय, द्वादश या दोनों घरों में हो या न हो ऐसे योग बताये हैं। अब सूर्य से द्वितीय, द्वादश या इन दोनों घरों में कोई ग्रह (चन्द्रमा के अतिरिक्त) हो तो क्या योग होते हैं यह बताते हैं। (१) सूर्य से द्वितीय में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि — इनमें से एक या अधिक ग्रह हों तो शुभवेसि योग होता है। (२) यदि सूर्य से द्वादश में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि — कोई ग्रह हो तो शुभवासि योग होता है। (३) यदि इन पाँचों ग्रहों में से एक या अधिक सूर्य से द्वादश में हो और एक या अधिक सूर्य से द्वितीय में हो तो उभयचरी योग होता है। उभयचरी का अर्थ है दोनों ओर। किसके? सूर्य जिस राशि में है उस राशि के दोनों ओर चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रह होने से यह शुभ योग बनता है। ऊपर जो तीन योग दिये गये हैं वे प्रायः सब ज्योतिष की पुस्तकों में उपलब्ध होते हैं, परन्तु इस सम्बन्ध में मन्त्रेश्वर महाराज कुछ विशेष निर्देश करते हैं। यदि शुभ ग्रह सूर्य के एक या दोनों ओर योग बनायें तो उनके मत से शुभवेसि, शुभवासि तथा शुभ उभयचरी योग हुआ। किन्तु यदि शुभ ग्रह के बजाय पाप ग्रह योग बनावें तो क्रमशः पापवेसि, पापवासि तथा पाप उभयचरी योग हुए। जैसे सूर्य के एक ओर या दोनों ओर ग्रह होने से योग बताये हैं वैसे ही लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि लग्न के दोनों ओर (द्वितीय और द्वादश में) पाप ग्रह हों तो पाप कर्त्तरी योग हुआ। किन्तु यदि लग्न के दोनों ओर अर्थात् द्वितीय स्थान तथा द्वादश स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों तो शुभ कर्त्तरी हुआ। यदि द्वितीय में (लग्न से दूसरे) शुभ ग्रह बैठा हो और इस शुभ ग्रह को कोई पाप ग्रह नहीं देखता हो तो सुशुभ नामक योग होता है। स्मरण रहे कि लग्न से द्वितीय में अच्छा योग बताया गया है। लग्न से द्वितीय में कोई शुभ ग्रह नहीं हो और लग्न से द्वादश में हो तो कोई योग नहीं होता। इसका कारण यह है कि द्वादश अनिष्ट स्थान माना गया है।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse