The person born in the Sasa Yoga will be extolled by all, will have good servants, will be strong, will be the headman of a village or a King, will be wicked in disposition, will have intrigues with women not his own, will usurp others' wealth and be happy. Just as these five Yogas arise when reckoned from the Lagna, similarly they are possible when counted even from the Moon's place. They bestow on the native an empire and perfection. The person who happens to have one, two, three, four or all the five Yogas will respectively be a (1) fortunate man (2) one equal to a King (3) a King, (4) an Emperor, and (5) one superior to No. 4.
जो व्यक्ति रुचक योग में पैदा होता है उसका दीर्घ चेहरा हो, बहुत साहस से धन प्राप्त करे, शूर और बली हो, शत्रुओं को मारने वाला (या पछाड़ने वाला) और अभिमानी हो। ऐसा व्यक्ति अभिमानी प्रकृति का होता है और सेनापति हो (सेनापति से तात्पर्य उच्च पदाधिकारी समझना चाहिये), अपने गुणों के कारण प्रसिद्ध, कीर्तिमान् हो और प्रत्येक उद्योग में विजयी हो। जो व्यक्ति भद्र योग में पैदा होगा वह कुशाग्र बुद्धि, शुद्ध हो (शरीर, वस्त्र, रहन-सहन स्वच्छ हो) और विद्वान आदमी उसकी प्रशंसा करें। स्वभाव में, भाषण देने में बहुत चतुर हो। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त वैभवशाली होता है और राजा (उच्च पदाधिकारी) होता है। जो हंस योग में उत्पन्न हो उसके हाथ और पैरों में शंख, कमल, मत्स्य और अंकुश के चिह्न हों। उसका शरीर देखने में बहुत शुभ (सुन्दर, सौम्य) हो। ऐसा व्यक्ति उत्तम भोजन करने वाला हो और सज्जन लोग उसकी प्रशंसा करें। जो व्यक्ति मालव्य योग में पैदा होता है वह धैर्यवान् और पुष्ट अंग वाला होता है। उत्तम भोजन करने वाला, विद्वान, प्रसन्नमुख, शान्तचित्त, पुत्र और स्त्रियों के सुख से युक्त, सर्वदा वृद्धि को प्राप्त, यशस्वी और अच्छी सवारियों का (मोटर आदि का) भोक्ता हो। जो व्यक्ति शश योग में उत्पन्न होते हैं वे अत्यन्त प्रभावशाली होते हैं। किसी ग्राम के मालिक हों या नृप (बहुत से मनुष्यों का स्वामी) अर्थात् उच्च पदाधिकारी हो। ऐसा व्यक्ति स्वयं बलवान होता है और उसकी मातहती में अच्छे-अच्छे लोग काम करते हैं। ऐसे लोगों की अन्य लोग तारीफ़ ज़रूर करेंगे। किन्तु वास्तव में शश योग में उत्पन्न लोगों का आचरण उत्तम नहीं होता। ऐसे व्यक्ति अन्य पुरुषों की स्त्रियों में आसक्त रहते हैं। ऐसे लोग धनी और सुखी होते हैं। ऊपर पाँच योग बताये गये हैं। मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि — इनमें से कोई ग्रह स्वराशि या उच्च राशि का होकर केन्द्र में हो तो क्रमशः ये पाँचों योग बनते हैं। यहाँ यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि मन्त्रेश्वर महाराज का कथन है कि यदि चन्द्र लग्न से केन्द्र में भी उपर्युक्त पाँचों ग्रहों में कोई स्वराशि या उच्च राशि का होकर चन्द्र-केन्द्र में हो तो साम्राज्य और सिद्धि प्रदान करने वाला होता है। कहने का तात्पर्य है कि जैसे जन्म लग्न से केन्द्र का विचार करना वैसे ही चन्द्र लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि कोई एक ग्रह उपर्युक्त प्रकार से योगकारक हो तो मनुष्य भाग्यवान् होता है। यदि दो ग्रह योग बनावें तो राजा के समान हो। तीन ग्रह योग बनावें तो राजा हो; चार ग्रह योग बनावें तो महाराजा हो और जिसकी कुण्डली में रुचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश — ये पाँचों योग हों वह इससे भी उच्च पदवी प्राप्त करता है। प्रायः ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थों में यह पंच महापुरुष योग बताये गये हैं। परन्तु 'मानसागरी' नामक पुस्तक में इस महापुरुष योग का भंग कैसे हो जाता है यह भी लिखा है। मानसागरी के कर्ता लिखते हैं कि यद्यपि मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के केन्द्र में, अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित होने से महापुरुष योग बताया गया है, किन्तु यदि जो ग्रह महापुरुष योग बना रहा है वह सूर्य या चन्द्रमा के साथ हो तो — ऐसे महापुरुष योग के प्रभाव से जातक 'राजा' (या राजतुल्य) नहीं होता है, परन्तु उसकी दशा में (या अन्तर्दशा में) केवल सत्फल (शुभ फल) होता है।
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