HomeLibraryPhaladeepikaCh.6Verse 35
Phaladeepika
Chapter 6 · yogādhyāya · योगाध्याय · Verse 35
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
लग्नाधिपाप्तभपतिस्थितराशिनाथः
स्वोच्चस्वभेशु यदि कोणचतुष्टयस्थः
योगःस कहल इति प्रथितोऽथत्तद्वत्
लग्नाधिपाप्तभप्तिर्यदि पर्वताख्यः
IAST Transliteration
lagnādhipāptabhapatisthitarāśināthaḥ svoccasvabheśu yadi koṇacatuṣṭayasthaḥ yogaḥsa kahala iti prathito'thattadvat lagnādhipāptabhaptiryadi parvatākhyaḥ
TranslationsTwo-source verified
English

Find where the lord of the Rasi occupied by the lord of the Lagna is posited. If the lord of this Rasi be in his exaltation or own sign identical with a Kona or Kendra, the Yoga is called Kahala. If the lord of the sign occupied by the lord of the Lagna be similarly situated, the resulting Yoga is termed Parvata.

Hindi

(१) जन्मकुण्डली में देखिये कि लग्नेश किस राशि में बैठा है — उस राशि का स्वामी जिस राशि में है, उस राशि का स्वामी अपनी उच्च राशि या स्वराशि में स्थित होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो काहल योग होता है। उदाहरण के लिये साथ की एक कुण्डली में मेष लग्न है। इसका स्वामी मंगल हुआ। मंगल सिंह राशि में बैठा है, इस सिंह राशि का स्वामी सूर्य है — सूर्य कुम्भ में बैठा है; और कुम्भ का स्वामी शनि तुला में उच्च का होकर लग्न से केन्द्र में बैठा है — इस कारण काहल योग हुआ। जो काहल योग में उत्पन्न होता है वह अच्छी बुद्धि वाला, वर्धिष्णु (वृद्धि को प्राप्त) श्रेष्ठ, प्रसन्न, दूसरों का कल्याण करने वाला और जनता द्वारा मान्य होगा अर्थात् लोग उसका आदर करेंगे। श्री आशुतोष मुकर्जी (जन्म २९ जून सन् १८६४) — इस कुण्डली में लग्नेश शुक्र मेष में है; मेष का मालिक मंगल है; मेष का मालिक (मंगल) अपनी राशि में है, परन्तु केन्द्र या त्रिकोण में नहीं है, इसलिये योग नहीं हुआ। श्री के० के० शाह — मंत्री, भारत सरकार (जन्म २७-१०-१९०८ को वृश्चिक लग्न में) — लग्न का स्वामी मंगल है; यह लग्नेश मकर में है, मकर का स्वामी शनि है; शनि कुम्भ में, कुम्भ का स्वामी शनि केन्द्र में है — इसलिये काहल योग हुआ। (२) इसी प्रकार यह देखिये कि जन्मकुण्डली में लग्नेश जिस राशि में है उस राशि का स्वामी कहाँ है। यदि लग्नेश जिस राशि में है उस राशि का स्वामी अपनी उच्च राशि या स्वराशि में स्थित होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो पर्वत योग होता है। साथ की उदाहरण कुण्डली में लग्नेश मंगल धनु राशि में है और इस धनु राशि का स्वामी बृहस्पति अपनी उच्च राशि (कर्क में) स्थित होकर केन्द्र में है — इस कारण पर्वत योग हुआ। जो पर्वत योग में उत्पन्न होता है उसका सुख और धन दोनों स्थिर रहते हैं, वह स्थिर कार्य करने वाला होता है अर्थात् उसके किये हुए कार्य दीर्घकाल तक रहते हैं। मकान बनाना, बाग़ लगाना, फ़ैक्टरी बनाना आदि स्थिर कार्य हैं। धर्मशाला बनाना, कुएँ या तालाब खुदवाना यह भी परोपकार के स्थिर कार्य हैं। पर्वत योग वाला मनुष्य 'क्षितीश्वर' (पृथ्वी, भूमि का मालिक या उच्च पदाधिकारी) होता है। श्री शाह की जन्मकुण्डली में पर्वत योग भी होता है क्योंकि लग्नेश (मंगल) स्थित राशि (मकर) का स्वामी शनि स्वराशि में केन्द्र में है। श्री मोरारजी देसाई (जन्म २९ फरवरी १८९६ को मिथुन लग्न में) — मिथुन लग्न का स्वामी बुध मकर में है। मकर का स्वामी शनि अपनी उच्च राशि में त्रिकोण में — इस कारण पर्वत योग हुआ।

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