HomeLibraryPhaladeepikaCh.6Verse 34
Phaladeepika
Chapter 6 · yogādhyāya · योगाध्याय · Verse 34
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
श्रीकटक्षनिलयः प्रभुराढ्यश्चित्रवस्त्रकनकाभरणश्च ।
पर्थिवाप्तबहुमानरसमाज्ञो यानवित्तसुतवांश्च महाख्ये
IAST Transliteration
śrīkaṭakṣanilayaḥ prabhurāḍhyaścitravastrakanakābharaṇaśca | parthivāptabahumānarasamājño yānavittasutavāṃśca mahākhye
TranslationsTwo-source verified
English

The person born in a Maha Yoga will be the repository of the blessings of the Goddess Sri and will be a lord and wealthy. He will wear clothes of variegated colour and bedeck himself with gold ornaments. He will receive rich presents from his sovereign and certain powers (authority) also will be conferred on him. He will command vehicles, wealth and children.

Hindi

इन तीन श्लोकों में ६६ योग बताये हैं। यदि दो स्थानों (भाव) के स्वामी परस्पर स्थान-परिवर्तन कर लें तो ये योग बनते हैं। (१) लग्नेश द्वितीय में, द्वितीयेश लग्न में, (२) लग्नेश चतुर्थ में, चतुर्थेश लग्न में, (३) लग्नेश पञ्चम में, पञ्चमेश लग्न में, (४) लग्नेश सप्तम में, सप्तमेश लग्न में, (५) लग्नेश नवम में, नवमेश लग्न में, (६) लग्नेश दशम में, दशमेश लग्न में, (७) लग्नेश लाभ में, लाभेश लग्न में (लाभ ग्यारहवें स्थान को कहते हैं), (८) धनेश चतुर्थ में और चतुर्थेश धन में (धनेश दूसरे घर के मालिक को कहते हैं), (९) धनेश पञ्चम में, पञ्चमेश धन में, (१०) धनेश सप्तम में और सप्तमेश धन में, (११) धनेश भाग्य में और भाग्येश धन में (भाग्य स्थान नवम स्थान को कहते हैं), (१२) धनेश दशम में और दशमेश धन में, (१३) धनेश लाभ में, लाभेश धन में, (१४) सुखेश पञ्चम में और पञ्चमेश सुख में (चौथे स्थान को सुख स्थान कहते हैं), (१५) सुखेश सप्तम में और सप्तमेश सुख में, (१६) सुखेश भाग्य में और भाग्येश सुख में, (१७) सुखेश दशम में, दशमेश सुख में, (१८) सुखेश लाभ में, लाभेश सुख में, (१९) पञ्चमेश सप्तम में, सप्तमेश पञ्चम में, (२०) पञ्चमेश भाग्य में और भाग्येश पञ्चम में, (२१) पञ्चमेश दशम में और दशमेश पञ्चम में, (२२) पञ्चमेश लाभ में तथा लाभेश पञ्चम में, (२३) सप्तमेश भाग्य में और भाग्येश सप्तम में, (२४) सप्तमेश दशम में और दशमेश सप्तम में, (२५) सप्तमेश लाभ में और लाभेश सप्तम में, (२६) भाग्येश राज्य में और राज्येश भाग्य में (दशम स्थान को राज्य स्थान कहते हैं), (२७) भाग्येश लाभ में और लाभेश भाग्य में, (२८) राज्येश लाभ में और लाभेश राज्य में। ऊपर जो २८ योग बताये गये हैं उन सबको 'महायोग' कहते हैं। जो व्यक्ति महायोग में पैदा होता है उस पर लक्ष्मी का कृपा-कटाक्ष होता है अर्थात् वह धनी होता है। ऐसा जातक अनेक व्यक्तियों का स्वामी, धनिक, सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण करने वाला, राजा (या सरकार) से सम्मानित और पुरस्कृत होगा। उच्च पदवी पर काम करे और उसे राजा से अधिकार मिले। ऐसे व्यक्ति को धन, पुत्र और सवारी का सुख प्राप्त हो। अब बाकी ३८ ऐसे योग बताते हैं जो अच्छे नहीं समझे जाते। इन ३८ योगों को दो भागों में बाँटा गया है। इनमें ८ तो खल योग कहलाते हैं और बाकी के ३० योग, दैन्य योग। दैन्य योग — (१) यदि व्ययेश लग्न में हो और लग्नेश व्यय में (बारहवें घर को व्यय स्थान कहते हैं), (२) यदि व्ययेश द्वितीय में हो और द्वितीयेश व्यय में, (३) यदि व्ययेश तृतीय में हो और तृतीयेश व्यय में, (४) यदि व्ययेश सुख में हो और सुखेश व्यय में, (५) यदि व्ययेश पञ्चम में हो और पञ्चमेश व्यय में, (६) यदि व्ययेश षष्ठ में हो और षष्ठेश व्यय में, (७) यदि व्ययेश सप्तम में हो और सप्तमेश व्यय में, (८) यदि व्ययेश अष्टम में हो और अष्टमेश व्यय में, (९) यदि व्ययेश भाग्य में हो और भाग्येश व्यय में, (१०) यदि व्ययेश राज्य में हो और राज्येश व्यय में, (११) यदि व्ययेश लाभ में हो और लाभेश व्यय में। (१२) यदि अष्टमेश लग्न में हो और लग्नेश अष्टम में, (१३) यदि अष्टमेश धन में हो और धनेश अष्टम में, (१४) यदि अष्टमेश तृतीय में हो और तृतीयेश अष्टम में, (१५) यदि अष्टमेश सुख में हो और सुखेश अष्टम में, (१६) यदि अष्टमेश पञ्चम में हो और पञ्चमेश अष्टम में, (१७) यदि अष्टमेश छठे में हो और षष्ठेश अष्टम में, (१८) यदि अष्टमेश सप्तम में हो और सप्तमेश अष्टम में, (१९) यदि अष्टमेश भाग्य में हो और भाग्येश अष्टम में, (२०) यदि अष्टमेश राज्य में और राज्येश अष्टम में, (२१) यदि अष्टमेश लाभ में हो और लाभेश अष्टम में। (२२) यदि षष्ठेश लग्न में हो और लग्नेश षष्ठ में, (२३) यदि षष्ठेश धन में और धनेश षष्ठ में, (२४) यदि षष्ठेश तृतीय में और तृतीयेश षष्ठ में, (२५) यदि षष्ठेश सुख में और सुखेश षष्ठ में, (२६) यदि षष्ठेश पञ्चम में और पञ्चमेश षष्ठ में, (२७) यदि षष्ठेश सप्तम में और सप्तमेश षष्ठ में, (२८) यदि षष्ठेश भाग्य में और भाग्येश षष्ठ में, (२९) यदि षष्ठेश राज्य में और राज्येश षष्ठ में, (३०) यदि षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में हो तो दैन्य योग होता है। यह तीसों योग दैन्य योग कहलाते हैं। जो व्यक्ति दैन्य योग में उत्पन्न होता है वह स्वयं मूर्ख, परन्तु दूसरों की निन्दा करने वाला, दुष्टकर्मा और सर्वदा शत्रुओं से पीड़ित रहता है। ऐसा व्यक्ति क्रूर वचन बोलता है और स्थिर-मति का नहीं होता। वह जिस भी कार्य को प्रारम्भ करेगा उसमें विघ्न और विच्छेद उत्पन्न हो जायेंगे। अब आठ खल योग बताये जाते हैं — (१) लग्नेश तृतीय में, तृतीयेश लग्न में, (२) धनेश तृतीय में, तृतीयेश धन में, (३) तृतीयेश चतुर्थ में, चतुर्थेश तृतीय में, (४) तृतीयेश पञ्चम में, पञ्चमेश तृतीय में, (५) तृतीयेश सप्तम में, सप्तमेश तृतीय में, (६) तृतीयेश भाग्य में, भाग्येश तृतीय में, (७) तृतीयेश राज्य में, राज्येश तृतीय में, (८) तृतीयेश लाभ में, लाभेश तृतीय में। यह ८ योग खल योग कहलाते हैं। यह आठों दुष्ट प्रभाव उत्पन्न करने वाले हैं इस कारण इन्हें 'खल' कहा है। जो व्यक्ति खल योग में उत्पन्न होता है वह कभी अनाचार के मार्ग पर चलने वाला, कभी सदाचार के मार्ग पर आरूढ़ — कभी अखिल सौभाग्यशाली, कभी पूर्ण दरिद्रता और दुःख प्राप्त करने वाला, कभी शुभवाणी बोलने वाला और कभी दुष्ट — इस प्रकार शुभ तथा अशुभ दोनों प्रभावों से युक्त होता है। शेष में इसका फल उत्तम नहीं माना है — शुभ प्रभाव कम और अशुभ प्रभाव अधिक है — इसीलिये 'खल' संज्ञा दी गई है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वयं मन्त्रेश्वर महाराज ने इसी अध्याय में आगे श्लोक ५७-७० में छठे घर का स्वामी यदि दुःस्थान में पड़े तो 'हर्षयोग', आठवें घर का स्वामी यदि दुःस्थान में पड़े तो 'सरल योग' और बारहवें घर का स्वामी यदि दुःस्थान में पड़े तो 'विमल योग' बतलाया है। फिर इन श्लोकों में जो छठे स्थान का स्वामी आठवें या बारहवें के स्वामी से स्थान-परिवर्तन करे, या आठवें का स्वामी बारहवें के मालिक से स्थान-परिवर्तन करे तो दैन्य योग — जिसका फल अच्छा नहीं है — क्यों कहा? इसमें हेतु यह है कि आगे के ५७वें श्लोक से ७० श्लोक तक जो योग बताये गये हैं उनमें स्थान-परिवर्तन वाली बात नहीं कही गई है और इन ३२ से ३४ श्लोकों में स्थान-परिवर्तन की शर्त लगाई गई है। किन्तु 'उत्तर कालामृत' खण्ड ४ श्लोक २२ में छठे, आठवें, बारहवें घर के मालिकों के परस्पर स्थान-परिवर्तन का जो उत्तम फल बताया गया है वह फलदीपिका के मत से बिल्कुल उलटा पड़ता है। उत्तर कालामृत का श्लोक है — "रन्ध्र्यंशो व्ययषष्ठगो रिपुपता रन्ध्र व्यये वा स्थिते रिःफेशोऽपि तथैव रन्ध्ररिपुयोरस्यास्ति तस्मिन्वदेत्। अन्योन्यर्क्षगता निरीक्षणयुताश्चान्यैर्युक्तेक्षिता जातोऽसौ नृपतिः प्रशस्तविभवो राजाधिराजेश्वरः॥" — अर्थात् यदि (१) आठवें घर का स्वामी बारहवें या छठे घर में हो, (२) छठे घर का स्वामी आठवें या बारहवें घर में हो, (३) बारहवें घर का स्वामी आठवें या छठे घर में हो, और (४) ये तीनों स्वामी एक-दूसरे की राशि में हों या एक-दूसरे से देखे जाते हों, और (५) अन्य भावों के स्वामियों से युत (सहित) या वीक्षित न हों, तो ऐसे योग में उत्पन्न मनुष्य बहुत वैभव वाला राजाधिराज नृपति होता है। इसे 'विपरीत राजयोग' कहते हैं — अर्थात् जो ग्रह सामान्यतः अनिष्ट फल उत्पन्न करने वाले हैं, उनसे शुभ फल उत्पन्न हो। यह उनके साधारण फल से जो उलटा फल हुआ इस कारण इसे विपरीत राजयोग की संज्ञा दी है। इसमें और फलदीपिका के योगों में कुछ विभिन्नता है — फलदीपिका में दो ग्रहों का (षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश में से कोई से दो ग्रहों के) परस्पर स्थान-परिवर्तन का फल बताया गया है, परन्तु उत्तर कालामृत में छठे, आठवें तथा बारहवें के मालिक तीनों दुःस्थान में हों, परस्पर युत या ईक्षित हों और अन्य किसी शुभ स्थान के स्वामियों से सम्बन्ध न करें — यह आवश्यक शर्त लगाई गई है। शुभ स्थानों के स्वामियों के परस्पर स्थान-परिवर्तन से जो महायोग कहे गये हैं उनके उदाहरण में कुछ जन्म-कुण्डलियाँ ओझा ने यहाँ दी हैं — श्रीमती इन्दिरा गांधी (जन्म प्रयाग, सूर्योदय के ४१ घड़ी ५२ पल २३ विपल बाद, १९ नवम्बर १९१७) — इनकी जन्म कुण्डली में लग्नेश सप्तम में तथा सप्तमेश लग्न में है, यह एक महायोग हुआ। द्वितीयेश पञ्चम में, पञ्चमेश द्वितीय में है — यह दूसरा महायोग हुआ। किन्तु षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में है — यह दैन्य योग है। इंग्लैण्ड की महारानी एलिज़बेथ (जन्म २१ अप्रैल १९२६ को लन्दन में रात्रि १:४० बजे वास्तविक समय) — इनकी कुण्डली में धनेश द्वादश में तथा द्वादशेश धन में है, यह दैन्य योग हुआ। सूर्य, मंगल अपनी उच्च राशि में है, चन्द्रमा अपने घर का है; यह सब उत्तम योग हैं। राजकन्या होने से महारानी हो गई। परन्तु इनका राजयोग क्रमशः पतनोन्मुख है। श्री रॉबर्ट निक्सन — अमेरिका के प्रेसीडेन्ट (जन्म ९ जनवरी १९१३, कैलिफ़ोर्निया, ३३°४७' उत्तर, ११७°५१' पश्चिम, रात्रि ९:३०) — इनमें सप्तमेश राज्य में, राज्येश सप्तम में है — यह महायोग है। महामहोपाध्याय श्री शिवकुमार शास्त्री जी (विक्रम संवत् १९०४ फाल्गुन कृष्ण एकादशी बुधे, सूर्योदयादिष्ट ४|३०) — इनमें लग्नेश चतुर्थ में, चतुर्थेश लग्न में महायोग करता है।

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