HomeLibraryPhaladeepikaCh.6Verse 17
Phaladeepika
Chapter 6 · yogādhyāya · योगाध्याय · Verse 17
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
क्वचित्क्वचिद्भाग्यपरिच्युतः सन्पुनः पुनः सर्वमुपैति भाग्यम् ।
लोकेऽप्रसिद्धोऽपरिहार्यमन्तः शल्यं प्रपन्नः शकटेऽतिःउखी
IAST Transliteration
kvacitkvacidbhāgyaparicyutaḥ sanpunaḥ punaḥ sarvamupaiti bhāgyam | loke'prasiddho'parihāryamantaḥ śalyaṃ prapannaḥ śakaṭe'tiḥukhī
TranslationsTwo-source verified
English

The person born in the Sakata Yoga will often become unfortunate (lose his luck), and may again regain what he once lost. He will be a very ordinary and insignificant man in the world. He will attain much mental grief that is inevitable and will be exceedingly unhappy.

Hindi

अब शकट योग का फल बताते हैं। शकट योग में उत्पन्न व्यक्ति अत्यन्त दुःखी होता है, इसके हृदय में ऐसा दुःख का काँटा लगा हुआ होता है कि उससे छुटकारा पाना कठिन है। ऐसा व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता और साधारण जीवन व्यतीत करेगा। कभी-कभी ऐसे व्यक्ति का सितारा बहुत तेज हो जाता है और कभी सितारा बिल्कुल गिर जाता है। इसी कारण कहा है कि कभी-कभी भाग्य से हीन हो जाय और फिर भाग्य को प्राप्त हो। उदाहरण के लिये माननीय स्वर्गवासी पंडित जवाहरलाल नेहरू जी की जन्मकुण्डली पर विचार कीजिये (प्रयाग में १४ नवम्बर सन् १८८९ को सूर्योदय से ४१ घड़ी ३८ पल पर जन्म)। यहाँ साथ की कुण्डली में चन्द्रमा से छठे बृहस्पति होने के कारण शकट योग होना चाहिये था, परन्तु केन्द्र में चन्द्र होने से नहीं हुआ। एक अन्य स्थान पर यह भी लिखा है कि चन्द्रमा से ३, ६, १०, ११ में शुभ ग्रह हो तो वसुमान् योग होता है। लग्न से ३, ६, १०, ११ में शुभ ग्रह होने से अति-वसुमान योग होता है (देखिये बृहज्जातक १३.९ तथा १३.२)। इसी प्रकार लिखा है कि यदि चन्द्रमा से ६, ७, ८ में सौम्य ग्रह हों तो बहुत उत्तम योग होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी-किसी योग में गुण और अवगुण दोनों होते हैं। साथ की कुण्डली में चन्द्रमा और बृहस्पति दोनों ग्रह बलवान हैं और अपने-अपने घर के हैं — इस कारण शुभ फल करेंगे ही। स्व० जयनारायण जी व्यास (जो कभी जोधपुर के चीफ मिनिस्टर रहे और पदच्युत हो गये, कभी राजस्थान के चीफ मिनिस्टर रहे और पदच्युत हो गये) की जन्मकुण्डली में शकट योग है। इस कारण जीवन में अनेक चढ़ाव-उतार देखने पड़े। (श्री जयनारायण जी व्यास का जन्म विक्रम संवत् १९५५ में माघ कृष्ण नवमी शनिवार को सूर्योदय के १२ घड़ी ४८ पल पर हुआ।)

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