If at a birth Mars be in the 5th house, the person concerned will be unhappy, without children, full of reverses, back-biting and weak-minded. If Mars occupy the 6th house, the person born will be exceedingly smitten with love, wealthy, and famous; he will be a King and victorious (in battle). Mars in the 7th house makes the person born do improper acts, suffer affliction through disease, wander in the roads and lose his wife. If Mars be in the 8th house, the person born will have a deformed body, will be poor, short-lived and cursed by the people.
यदि पंचम में मंगल हो तो सन्तान का सुख न हो; उसके भाग्य में बहुत से अनर्थ (खराबी की बातें) होते रहें। ऐसा व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् नहीं होता और चुगलखोर होता है। छठे में मंगल हो तो मनुष्य लक्ष्मीवान्, विख्यात, शत्रुओं को जीतने वाला, राजा के समान ऐश्वर्यशाली होता है; छठे में मंगल होने से 'प्रबल-मदनः' विशेष कामी हो। यदि सप्तम में मंगल हो तो अनुचित कर्म करने वाला, रोग से पीड़ित, मार्ग चलने वाला और मृत-दारावान् (जिसकी स्त्री मर जाय) होता है। सप्तम पत्नी का स्थान है। सप्तम में मंगल होने से जातक प्रबल मंगलीक होते हैं, इस कारण उनकी पत्नी मर जावे यह लिखा है। किन्तु यदि पत्नी भी मंगलीक हो तो दोनों (पति-पत्नी) के मंगलीक होने से यह दोष नहीं होता, अर्थात् इस दोष की निवृत्ति हो जाती है। जिस मनुष्य की कुंडली मंगलीक हो उसे मंगलीक कन्या से ही विवाह करना चाहिये तथा जो कन्या मंगलीक हो उसका विवाह मंगलीक वर से ही करना उचित है। मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य — यह पाँच ग्रह क्रूर हैं। लग्न से द्वितीय (दूसरा घर कुटुम्ब-स्थान कहलाता है; पत्नी 'कुटुम्ब' का प्रधान केन्द्रीय स्तम्भ है, यदि केन्द्रीय स्तम्भ टूट जावे तो शामियाना गिर पड़ता है — इस प्रकार यदि पत्नी नष्ट हो जावे तो कुटुम्ब कैसे बढ़ेगा), चतुर्थ (सुख-स्थान, घर का विचार भी चौथे घर से; गृहिणी न रहे तो घर कैसा?), सप्तम (पत्नी का स्थान), अष्टम (लिङ्ग-मूल से गुदा-पर्यन्त अष्टम भाव; इस भाव का पत्नी से सम्बन्ध स्पष्ट है) तथा द्वादश (बारहवाँ घर 'शयन-सुख' कहलाता है; शय्या का परम सुख कान्ता है) — इन पाँच स्थानों में क्रूर ग्रह मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य जिस भाव में हों उस भाव-सम्बन्धी सुख की कमी करते हैं। इसका विचार जन्म-कुण्डली, चन्द्र-कुण्डली (चन्द्रमा जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर) तथा शुक्र से (शुक्र 'काम' का अधिष्ठाता है, सप्तम भाव का कारक है, इसलिये वैवाहिक सुख-विचार में शुक्र का महत्व है) करना चाहिये। स्त्रियों की कामवासना का मंगल से विशेष विचार करना चाहिये। स्त्रियों के मासिक धर्म-प्रवाह का वर्ण रक्त है; पुरुष की कामवासना का विचार शुक्र से (इसी कारण शुक्र वीर्य को भी कहते हैं, जिसका सफेद वर्ण है) किया जाता है। मंगल मकर में उच्च का होता है, शुक्र मीन में उच्च का होता है। इसी कारण कन्दर्प या कामदेव का नाम संस्कृत में मकरध्वज (मकर जिसकी ध्वजा में है) और मीनकेतन (मीन जिसके झंडे में है) कहा जाता है। न कामदेव नाम का कोई शारीरिक जन्तु या व्यक्ति है, न उसका कोई झंडा है — केवल एक सिद्धान्त को व्यक्त करने वाले ये विशेषण हैं। काम का जल-तत्व से विशेष सम्बन्ध है। समुद्र (जल) से लक्ष्मी हुई; लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र से इसी कारण मानी गई है। चन्द्रमा जल-तत्व प्रधान होने से लक्ष्मी का भाई माना गया; लक्ष्मी का पुत्र कामदेव भी इसी जल-तत्व के कारण माना गया है। वसन्त-पंचमी को जब प्रायः शुक्र उच्च का होता है — कामदेव का जन्मदिन माना जाता है। वनस्पति जगत् में पहले कली होती है, इसमें जो पराग होता है उसे 'रज' कहते हैं; कन्याओं में काम प्रकट होने का प्रथम लक्षण रजोदर्शन है। इसी कारण दोनों (कलियों तथा कन्याओं) के सम्बन्ध में 'रज' शब्द का प्रयोग किया गया है। पुष्प विकसित रूप है, इसीलिये मासिक धर्म में जब स्त्री होती है तो उसे संस्कृत में पुष्पिणी कहते हैं। इन्हीं — पुष्प को — कामदेव का बाण कहते हैं; उसके पाँच बाण हैं जो फूलों के हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध — इन्हीं पाँच से मनुष्य में कामवासना उत्पन्न होती है, यही उसके पाँच बाण हैं। इस प्रकार ज्योतिष-शास्त्र में जो निर्देश किये गये हैं वे गूढ़ सिद्धान्तों पर आधारित हैं — केवल थोड़ा सा दिग्दर्शन करा दिया गया है। अब आठवें घर के मंगल का फल बताते हैं। अष्टम में भी मंगल का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कुतनु (खराब शरीर वाला — शरीर में कहीं रोग हो), धन-हीन और अल्पायु होता है और लोग उसकी निन्दा करते हैं।
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