HomeLibraryPhaladeepikaCh.8Verse 2
Phaladeepika
Chapter 8 · bhāvāśraya phala · भावाश्रय फल · Verse 2
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
विगतविद्या विनयवित्तं स्खलितवाचं धनगतः
सबलशौर्य श्रियमुदारं स्वजनशत्रुं सहजगः ।
जनयतीमं सुहृदि सूर्यो विसुखबन्धुक्षितिसुहृद्
भवनसुक्तं नृपतिसेवा जनकसम्पद्व्ययकरम्
IAST Transliteration
vigatavidyā vinayavittaṃ skhalitavācaṃ dhanagataḥ sabalaśaurya śriyamudāraṃ svajanaśatruṃ sahajagaḥ | janayatīmaṃ suhṛdi sūryo visukhabandhukṣitisuhṛd bhavanasuktaṃ nṛpatisevā janakasampadvyayakaram
TranslationsTwo-source verified
Hindi

यदि सूर्य द्वितीय में हो तो मनुष्य विद्या, विनय और धन से हीन होता है; उसकी वाणी में भी दोष होता है — हकलाना या इसी प्रकार का दोष ही। यदि सूर्य तृतीय में हो तो मनुष्य बलवान्, शूरवीर, धनी और उदार होता है, किन्तु अपने (सम्बन्धी) लोगों से शत्रुता रखता है। यदि चौथे स्थान में सूर्य हो तो सुख-हीन, बन्धु-हीन, मित्र-हीन और भूमि-हीन हो; मकान-हीन भी हो। चतुर्थ से इन सब बातों का विचार किया जाता है और क्रूर ग्रह के बैठने का यह फल है। ऐसा व्यक्ति अपने पिता से पाई हुई जायदाद या सम्पत्ति को व्यय कर देता है और राजा (सरकार) की सेवा करता है।

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