HomeLibraryPhaladeepikaCh.15Verse 5
Phaladeepika
Chapter 15 · bhāvacintā · भावचिन्ता · Verse 5
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
यद्भावनाथो रिपुरन्ध्ररिःफे दुःस्थानपो यद्भवनस्थितो वा ।
तद्भावनाशं कथयन्ति तज्ज्ञाः शुभेक्षितस्तद्भवनस्य सौख्यम्
IAST Transliteration
yadbhāvanātho ripurandhrariḥphe duḥsthānapo yadbhavanasthito vā | tadbhāvanāśaṃ kathayanti tajjñāḥ śubhekṣitastadbhavanasya saukhyam
TranslationsTwo-source verified
English

When a Bhava has its lord in the 6th, the 8th or the 12th, or is occupied by the lord of any of these three, it suffers annihilation, say those that know the properties of a Bhava. If such a Bhava be aspected by a benefic planet, it will be in a flourishing condition.

Hindi

जिस भाव का विचार करना हो, उस भाव का स्वामी यदि लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में बैठा हो तो उस भाव को बिगाड़ता है। यह साधारण नियम है। उदाहरण के लिए यदि लग्नेश अष्टम में हो तो शरीर-पक्ष निर्बल या रोगग्रस्त रहेगा। यदि सप्तम का स्वामी अष्टम में हो तो स्त्रीसुख में कमी करेगा। किन्तु इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं। जिसके लिए देखिये अध्याय ६, श्लोक ५७। जिस भाव का विचार कर रहे हों उस भाव में यदि त्रिक का स्वामी बैठा हो तो भी जिस भाव में बैठा है उस भाव को बिगाड़ता है। उदाहरण के लिए यदि अष्टमेश दशम में बैठा हो तो दशम स्थान को बिगाड़ेगा। यहाँ भी एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि त्रिक का स्वामी होने के साथ-साथ वह ग्रह लग्न का भी स्वामी हो तो दोष पैदा नहीं करता। ऊपर दो स्थितियाँ बताई — विचारणीय भाव का स्वामी दुःस्थान में बैठे वह भी खराब और दुःस्थान का स्वामी विचारणीय भाव में बैठे वह भी खराब, किन्तु इन दोनों नियमों का एक अपवाद है कि जिस भाव का विचार कर रहे हैं उस पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तो उस भाव सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है।

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