HomeLibraryPhaladeepikaCh.20Verse 56
Phaladeepika
Chapter 20 · antardaśāphala · अन्तर्दशाफल · Verse 56
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
भ्रष्ठस्य तुङ्गादवरोहिसंज्ञा
मध्या भवेत्सा सुहृदुच्चभागे ।
आरोहिणी निम्नपरिच्युतस्य
नीचारिभांशेष्वधमा भवेत्सा
IAST Transliteration
bhraṣṭhasya tuṅgādavarohisaṃjñā madhyā bhavetsā suhṛduccabhāge | ārohiṇī nimnaparicyutasya nīcāribhāṃśeṣvadhamā bhavetsā
TranslationsTwo-source verified
English

The Dasa of a planet fallen from exaltation is termed (Avarohini) or descending; while that of a planet in a friend's or exaltation house is named (Madhya) or middling. The Dasa of a planet proceeding from his depression is called (Arohini) or rising. The Dasa of a planet that is actually in his depression or inimical Rasi or in his depression or inimical Amsa is termed (Adhama) or worst.

Hindi

पहले बताया जा चुका है कि किसी राशि के किस अंश पर कौनसा ग्रह परम उच्च होता है और किस राशि के किस अंश पर परम नीच होता है। उदाहरण के लिये मेष राशि के दस अंश पर सूर्य परम उच्च होता है और तुला राशि के दस अंश पर सूर्य परम नीच होता है। तो तुला के दस अंश से निकल कर जब तक मेष के दस अंश पर सूर्य नहीं पहुँचेगा तब तक उसे आरोही अर्थात् चढ़ता हुआ कहेंगे (अपने उच्च भाव की ओर जा रहा है इसलिये चढ़ता हुआ कहा), और मेष के १० अंश को पार कर जब तक तुला के दस अंश तक सूर्य न पहुँचे तब तक उसे अवरोही अर्थात् उतरता हुआ कहते हैं (अपनी नीच राशि की ओर जा रहा है इसलिये उतरता हुआ कहा)। यदि किसी अवरोही ग्रह की दशा हो तो उत्तम नहीं; यदि किसी आरोही ग्रह की दशा हो तो उत्तम है। किन्तु चाहे अवरोही ही हो, दशा यदि ग्रह अपने मित्र के नवांश में या उच्च नवांश में हो तो उतनी खराब नहीं होती, बल्कि साधारणतया अच्छी हो जाती है। लेकिन इसके विपरीत चाहे कोई ग्रह आरोही ही क्यों न हो, यदि वह नीच राशि, शत्रु राशि, नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो अधमा होती है — उसकी दशा खराब जाती है। 'बृहत् जातक' के अष्टम अध्याय में इसे बहुत अच्छी तरह समझाया गया है: (क) यदि कोई ग्रह बहुत बलवान् हो या परमोच्च हो तो उसकी दशा सम्पूर्ण धन और आरोग्य देने वाली होती है; (ख) यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में है और किंचित् बल-युक्त भी है तो उसकी दशा 'पूर्णा' कहलाती है — इसकी दशा-अन्तर्दशा में धन-वृद्धि होती है; (ग) यदि कोई ग्रह निर्बल हो तो उसकी दशा 'रिक्ता' कहलाती है — रिक्ता दशा में स्वास्थ्य और धन की कमी रहती है और रोग तथा दरिद्रता की बहुतायत रहती है; (घ) यदि कोई ग्रह नीच नवांश या शत्रु नवांश में हो तो 'अनिष्टफला' कहलाती है — इसमें शारीरिक और धन-विषयक कष्ट होता है; (ङ) यदि कोई ग्रह अवरोही हो किन्तु मित्र या अधिमित्र नवांश में हो तो 'मध्या' कहलाती है — इसमें किंचित् वृद्धि होती है।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse