If the lord of a Kendra be (in conjunction) associated with the lord of a Trikona, both of them become powerful in promoting the prosperity of the native. Should a lord of another Trikona also be related (vide XV-30 supra), where is the doubt about the native's prosperity being still further advanced?
यदि किसी केन्द्र के स्वामी का दोनों त्रिकोणों में से एक के स्वामी के साथ ऐक्य हो (दोनों एक साथ हों) तो इस ऐक्य के कारण यह दोनों (परस्पर सम्बन्ध करने वाले त्रिकोणेश और केन्द्रेश) योगकारक हो जाते हैं। यदि केन्द्रनाथ एक त्रिकोणाधिपति से सम्बन्ध करे और साथ ही साथ दूसरे त्रिकोणपति से भी सम्बन्ध कर ले तो फिर कहना ही क्या है, अर्थात् किसी एक केन्द्रनाथ का दोनों त्रिकोणेशों से सम्बन्ध होना बहुत बड़ा राजयोग है। यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि यदि एक ही ग्रह केन्द्र और कोण का स्वामी हो तो वह स्वयं योगकारक हो जाता है — जैसे कर्क और सिंह लग्न वाले के लिये मंगल; मकर और कुम्भ वाले के लिये शुक्र; वृष और तुला लग्न वाले के लिये शनि। ऐसा योगकारक ग्रह अपनी अन्तर्दशा में भाग्योदय करता है।
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