अन्वय:--धनुरमषर्सिहेष् रवौ यात्रा प्रशस्ता स्यात्, च शनिज्ञोशनोराशिगे रवौ मध्या स्यात्, ककंमीनालिसंस्थे रवौ अतिदीर्षा यात्रा स्थातू, तथा जन्: पञ्चसप्तत्रितारा: नेष्टा: ॥ ८ ॥। धनु, मेष वा सिह में सूर्य होतो यात्रा उत्तम; मकर, कुम्भ, मिथुन, कन्या, वृष वा तुला में सूर्य हो तो यात्रा मध्यम; और कक॑, वृश्चिक वा मीन में सूर्य हो तो यात्रा बहुत दिनों में लौटानेवाली अर्थात् अशुभ होती है। जन्मनक्षत्र से यात्रा के दिननक्षत्र तक गिनने से जितनी संख्या हो उसमें नौ का भाग देने से १।३। ४ वा ७ शेष रहे तो शुभ नहीं होते, अर्थात् यात्रा में पहिली, पाँचवीं, सातवीं और निषिद्ध है ॥ ८॥ यात्रा में निषिद्धतिथि और विहिंततिथि न षष्ठी न व द्वादशी नाष्टसी लो सिताद्या तिथिः पूणिमाध्मा न रिक्ता। तीसरी तारा हयादित्यमंत्रेन्दुजीवान्त्यहस्त- श्रवों वासवरेव यात्रा प्रशस्ता ॥ ९॥
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