Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 8
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

ोण (स्थितः) अन्वयः-- सौरिशुक्रज्जीवा: (सर्वे) वा एको&पि यदा कुजात्‌ त्रिक त तयोमेध्ये यः बा शशी अर्कात॒ त्रिकोणे स्थात्‌ तदा गमः [गमनं | नो भवेत, प्रत्यु िगीशात्‌ पञुचमग: य: ग्रह: बलीयान्‌ स्थात्‌ असौ स्वकीयां दिश नयेत्‌ । प्रश्ने गम्यद :* खेटः बलयुकत: बोभूयात्‌ असौ स्वां आशां नयते ॥ ६-७॥ कः १०". अकननरलक का नअमन ५न+-कनिनिननगा डकलनमननन-- नकल 2 ५ मल कक के अली की खा आल क>पशीजज आमी ज्जनजाज यात्राप्रकरण १६७ प्रशनकाल में शनेद्चर, शुक्र, बुध, बृहस्पति, ये चारों ग्रह या इनमें से कोई एक ही ग्रह यदि मंगल से नवें, पाँचवें स्थान में स्थित हो, अथवा चन्द्रमा यदि सूर्य से नवें, पाँचवें स्थान में हो, तो यात्रा करनेवाला जिस दिशा में जाने की इच्छा करता है उस दिशा में यात्रा नहीं होती, कितु इन यात्राप्रतिबंधक ग्रहों में से जो ग्रह बलवान्‌ होता है वह अपनी ही दिशा में लेजाता है अथवा जिस दिशा में यात्रा करने की इच्छा से प्रश्न किया गया हो उस दिशा का स्वामी प्रइनलरन से जिस स्थान में स्थित हो उस स्थान से पाँचवें स्थान में यदि कोई बली ग्रह हो तो वह ग्रह अपनी ही दिशा में यात्रा करनेवाले को ले जाता है । ग्रहों कीदिशा इसी प्रकरण के ४६ वें इलोक में कही गई हैं ।। ६-७ ॥। मासभेद से यात्रा के जञभाशभभेद और तारा धनुर्मेषसिहेषु यात्रा प्रहस्ता शनिज्ञोशनोराशिगे चेव मध्या। रवो ककमीनालिसंस्थ5तिदीर्घा जनुःपठचसप्तत्रिताराइच नेष्टा: ॥ ८॥।

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