अन्वयः--ज्ञेज्यसितेषु एक: (यदि )पञचमतप:केन्द्रेष (स्थित: तंदा ) योगः (स्यात्) तथा तेषु चेत् द्वो [स्थितौ] (तदा) अधियोगः एबू् यदि सकला: (स्थिता: तंदा ) योगाधियोग: स्मृतः । अथ योगे [गमने ] क्षेमं, अधियोगगमने क्षेमं, रिपूर्णां वध च लभते, योगाधिथोगे ब्रजन् क्षेमयशो5वनीश्च लभते ।। ७६ |। पाँचवें, नवें, पहिले, चौथे, सातवें, दसवें इन स्थानों में यदि बुध, बृहस्पति अथवा शुक्र इनमें सेकोई एक ग्रह स्थित हो तो योग, दो ग्रह एक साथ अथवा अलग-अलग इन्हीं स्थानों में स्थित हों तोअधियोग और तीनों ग्रह साथ अथवा अलग-अलग इन्हीं स्थानों में स्थित हों तोयोगाधियोग होता है। योग में यात्रा करने से क्षेम, अधियोग में यात्रा करने से क्षेम और शत्रुओं का नाश और योगाधियोग में यात्रा करने से क्षेम, यश तथा पृथ्वी का लाभ होता है ॥ ७६ ॥। १९६ मुहृत्तचिन्तामणि विजयादशमी की प्रशंसा इषमासि सिता दशमी विजया शुभकमंसु सिद्धिकरी कथिता । श्रवणक्षयुता सुतरां शुभदा नपतेस्तु गसे जयसन्धिकरी ॥ ७७॥
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