Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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अन्वयः--अशुभखग: अनवाष्टमदस्थः, कवि: हिबुक सहोदरलाभगृहस्थः केन्द्र- गगीष्पतिदृष्ट: इह खलु (निश्चयेन) वसुचयलाभकर: योग: स्यात् ॥| ७० ।। अथवा यदि नवें, आठवें, सातवें इन स्थानों को छोड़कर अन्य स्थानों में पापग्रह स्थित हों और चौथे, तीसरे, गेरहवें इन स्थानों में स्थित शुक्र को केन्द्रस्थ बृहस्पति देखता हो तो यह योग यात्रा करनेवाले लाभ कराता है ॥ ७० |। को धनसमूह का रिपुलग्तकमं हिबुकेशशिजे परिवीक्षिते शुभनभोगमनः । व्ययलग्नमन्मंथग॒हेषु जयः परिवर्जितेष्वशुभनामधर: ॥ ७१॥
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