Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 68
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

>> रू.+०१ यात्राप्रकरण १९३२ अन्वयः--त्रिदशगुरुः तप्ुगः. हिमकिरण: मदने, रवि: आयगत:, सितशशिजौ कर्मे- गतौ, रविसुतभूमिसुतौ सहजे, (तदापि जय: स्यात्‌ ) ।! ६७ ॥ अथवा यदि बृहस्पति लग्न में, चन्द्रमा सातवें स्थान में, सूर्य गेरहवें स्थान में और शुक्र, बुध ये दोनों दशवें स्थान में, शनेश्चर और मंगल ये दोनों तीसरे स्थान में स्थित हों, ऐसे योग में यात्रा करने से शत्रु राजा के अधीन हो जाते हैं | ६७ ॥ देवगुरौ वा शशिनि तनुस्थे वासरनाथे रिपुभवनस्थे । पञचमगेहे हिमकरपुत्रः कर्मणि सौरि: सुह॒दि सितशच ॥ ६८४ अन्वयः--देवगूरौ वा शशिनि तनुस्थे, वासरनाथे रिपुभवनस्थे, हिमकरपुत्र: पठचमगेहे, सौरि: कर्मणि, च सितः सुहृदि (तदापि जय: स्यात्‌ ) ।। ६८॥।

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