Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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के मे, अन्वयः--तथा तनौ शशिकुजौ, दशमभे रविः, बुध: भृगुसुतो्षि लाभदश जय: स्यात् )॥ ६५॥। भूसुतशनी त्िलाभरिपुभेषु (स्थितौ) ग्ंरुज्ञभुगुजा: बलयुता: (तदा स्थान में अथवा यदि लग्न में शनैश्चर, मंगल ये दोनों स्थित हों, दशवे योग में यात्रा सूये होऔर दशरवें या गेरहवें स्थान में बुध वा शुक्र हो, ऐसे गेरहवें इन तीनों करनेवाले राजा की विजय होती है । अथवा तीसरे, छठे, होकर स्थानों में कहीं मंगल, शनैरचर हों और बृहस्पति, बुध, शुक्र ये बली विजय होती कहीं भी स्थित हों, ऐसे योग में भी यात्रा करनेवाले राजा की है है ।। ६५ |। समुदयगे विद्रुधगुराौ मदनगते हिसकिरण । हिबुकगतो बुधभुगुजो सहजगताः खलखचराः ॥ ६६॥
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