Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वयः--पूषभात् कत्तिकादें पादे यावत् चन्द्र: (तिष्ठति) तावत् शुक्र: अन्ध: (भवति तदा) अग्रदक्षे दुष्ट: न (भवेत्), मध्ये मार्ग अपि भागेवास्ते अधि वा तस्य सम्मखत्वे राजा तावत् तिष्ठेत् ।| ४२ || जब तक चन्द्रमा रेवती से लेकर क्त्तिका के पहिले चरण तक रहता है तब तक शुक्र अन्धा रहता है। इस कारण सम्मुख व दाहिने दोषकारक नहीं होता । कदाचित् मार्ग ही में शुक्र अस्त हो तो राजा को चाहिए कि जब तक फिर उदित न हो तब तक वहीं टिका रहे और उदित होने पर भी यदि सम्मुख पड़ता होतो जब तक फिर पीछे या बायें न हो तब तक वहीं टिका रहे ॥ ४२ ॥। लग्नविशेष का त्याग कुम्भकुम्भांशकौ त्याज्यौ सवेथा यत्नतो बुधः। तत्र. प्रयातुन पतेरर्थनाश: पदे पदे ॥ ४३॥
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