Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 38
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--नृपः पुरुहतदिग्भे: अग्ने: दिशं इयात्‌, एवं प्रदक्षिणगता: विदिशः (इयात्‌), अथ आवश्यके कृत्ये शूलं विहाय यदि दिकतनुशुद्धि: अस्ति, तदा परिघ प्रविलंघ्य अपि गच्छेत्‌ ॥| ३७ ॥। राजा को चाहिए कि पूर्व दिशा के नक्षत्रों मेंआग्नेय कोण की यात्रा करे, दक्षिण दिशा के नक्षत्रों में नऋत्य कोण की, पश्चिम दिशा के नक्षत्रों मेंवायव्य कोण की, और उत्तर दिशा के नक्षत्रों मेंईशान कोण की यात्रा करें। यदि कोई अत्यावश्यक काये हो तो दिकक्‍्शूल और परिघदण्ड का उल्लंघन करके भी यात्रा करे। यदि दिग्लग्न शुद्ध हो, अर्थात्‌ मेषादि चार चार राशियाँ पूर्वादि चारों दिशाओं की स्वामिनी हैं, इस क्रम से यदि लग्न सम्मुख पड़ती हो और लग्न से आठवें आदि स्थानों में कोई अनिष्ट ग्रह न हो। यथा श्रवण नक्षत्र में पूर्व कीयात्रा आवश्यक हो तो मेष या सिंह या भन लग्न में करे ॥| ३७॥। परिघदण्ड का अन्य अपवाद तथा केन्द्र आदि स्थानों में बक्रीग्रह का निषेध मेत्राकपुष्याश्विनिभनिरुक्ता यात्रा शञुभा सर्वदिशासु तज्ज्ञः । वक्रीग्रहः केन्द्रगतो5स्यवर्गों लग्ने दिनं चास्य गसे निषिद्धम्‌ ॥ ३८॥।

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