Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 37
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्बयः--अमलक्षतः सप्त सप्त [नक्षत्राणि] पूर्वादिषु चतुदिक्षु (ज्ञेयानि) (तत्र) वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नव लंघयेत्‌ ॥ ३६ ॥। चतुष्कोण चंक्र बनाकर उसमें क्ृत्तिका सेलेकर सात सात नक्षत्र चारों दिशाओं में लिखे, अर्थात्‌ कृत्तिका से श्लेषा तक पूर्व में, मघा से विशाखा तक दक्षिण में, अनुराधा से श्रवण तक परिचिम में और धनिष्ठा से भरणी तक उत्तर में । उसी चक्र में वायव्य कोण से आग्नेय कोण में गई हुई रेखा का परिघदण्ड नाम है यात्रा में उसका उल्लंघत न करे,. अर्थात्‌ उत्तर और पूर्व दिशा के नक्षत्रों मेंदक्षिण और पश्चिम की यात्रा तथा दक्षिण और पर्चिम दिशा के नक्षत्रों मेंउत्तर और पूर्व दिशा की यात्रा न करे ॥| ३६॥। परिघदण्ड चक्र 5 रु ञऊ है 4 रू 53 छू के): ९ (४3, £ ] क् । यात्रा प्रकरण १८३ आग्नेयादि. कोणों की यात्रा तथा परिघदण्ड का अपवाद अग्नेदिशं नप इयात्पुरुहतदिस्भेरेवं प्रदक्षिणणता विदिश्ो $थ कृत्ये । आवश्यके5पि परिघं प्रविलड्डः्र गच्छेच्छुलं विहाय यदि दिकतनुशुद्धिरस्ति ॥ ३७॥

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