Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 36
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--कौब रीत: (उत्तरदिशमा रभ्य क्रमंण) अर्काद्ये वारे काल: (स्यात्‌) तस्य सम्मुखे पाश: (स्यात) एतौ [कालपाशौ | रात्नौ वेपरीत्येन गण्यौ (तो) यात्रायुद्धे सम्मृखे वर्जनीयाों ॥ ३५॥। रविवार आदि में उत्तर दिशा से लेकर विपरीतक्रम से काल रहता है, अर्थात्‌ रविवार के दिन उत्तर में, सोमवार के दिन वायबव्य में, मंगल के दिन पश्चिम में, बुध के दिन नेऋत्य में, बृहस्पति के दिन दक्षिण में, शुक्र के दिन आग्नेय में, शनैश्चर के दिन पूर्व दिशा में काल रहता है, और काल के सम्मुख पाश रहता है, अर्थात्‌ रविवार के दिन दक्षिण में, सोमवार के दिन आग्नेय में, मंगल के दिन पूर्व में, बुध के दिन ईशान में, बृहस्पति के दिन उत्तर में, शुक्र के दिम वायव्य में, शर्नेइचर के दिन पश्चिम दिशा में पाश रहता है। ये दोनों रात्रि में इससे विपरीत रहते हैं। जैसे रविवार की रात्रि में काल दक्षिण में और पाश उत्तर में रहता है। ऐसे ही सोमवार आदि में भी जानना चाहिए। ये दोनों यात्रा तथा युद्ध में सम्मुख वर्जनीय हैं ।। ३५॥। क जन्‍म प3262/20#/24%7777 76279: ++/४++++-+५६+++६६६३३४५६४६-६+++ ४४ ३३६-) ननसससििनननता कमल -०६६३४-७४७४४)-६६७०३७३६४४४४४६६७ ६)- न्न्न्न्न्न्न्न्ज््ज्न््न्््ट ड़ ० ---->-----_-_-_-््ग्ग्न््न् मुह॒त्तचिन्तामणि श्८२ कालपाशचक्र प० | ने० |द० ० |बा० |2 0 में काल ि दिना व |आ० | पू० ड द० |आ० | पू० | ई० | उ० |वा० | प० | दिशा दिन में पाश द० |आ० |पृ० | ई० | उ० |वा० |प० |दिशा रात्रि में काल दिशा रात्रि में पाश बा वि |नैे० | द० |आ० क्‍ ॥॥ |! द क्‍ परिघदण्ड दोष चतुर्दिक्षु॒ सप्तसप्तानलक्षतः । पूर्वादिष॒ वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नव लड्भ-येत्‌ ॥ ३६॥

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