Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 25
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--तिथ्यक्षवारयृति: स्थानत्नये अत्न (स्थाप्या) (क्रमेण) अद्विगजाग्नितष्टा प्रथमे [स्थाने] वियति शून्ये सति अतिदु:खी स्यात्‌, मध्ये वियति (सति) धनक्षति: स्यात्‌ु,; अथो चरमे वियति मृतिः स्यात्‌, स्थानत्रये अंकयूजि (सति) सौख्यजयौ निरुक्‍तो ॥| २४ ॥। जिस दिन यात्रा करना हो उस दिन शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जो तिथि हो, अदिवनी से लेकर जो नक्षत्र होऔर रविवार से लेकर जो दिन हो, उन सबकी संख्याओं के योग को तीन स्थानों में रक्‍्खे । प्रथम स्थान में सात का, दूसरे स्थान में आठ का, तीसरे स्थान में तीन का भाग दे। उन तीनों स्थानों में या प्रथम स्थान में शून्य शेष रहे तो यात्रा करनेवाला अतिदु:खी होता है, दूसरे स्थान में शून्य शेष रहे तो धन की हानि और तीसरे स्थान में शून्य बचे तो मृत्यु होती है । तीनों स्थानों में यदि अंक दोष हों तो यात्रा करनेवाला सुखी तथा विजयी होता है । उदाहरण--जसे कात्तिक शुक्ल द्वितीया को मंगल दिन, अनुराधा नक्षत्र में यात्रा करना है । यहाँ तिथि की संख्या २, दिन की संख्या ३, नक्षत्र की संख्या १७ हुई । इन सबका योग २२ हुआ । इसको तीन स्थानों में रक्‍्खे । प्रथम स्थान में सात का भाग देने से एक, दूसरे स्थान में आठ का भाग देने से छः और तीसरे स्थान में तीन का भाग देने से एक शेष रहा । यहाँ तीनों स्थानों में अंक शेष हैं, इसलिए इस दिन की यात्रा सुख और विजय देनेवाली होगी ॥ २४ ॥। महाडल और भ्रमण योग दद्चगाः । रवेभतो5ब्जभोन्मितिनंगावशेषिता. महाडलो न शस्यते त्रिषण्सिता श्रमों भवेत्‌ ॥ २५४ अन्बयः--रवेभतः अब्जभोन्मिति: नगावशेषिताः दच्गा: [द्विसप्तमिता: चेत्‌|तदा महाडल: स्यात्‌ (स) न शस्यते, (यदि) त्रिषण्मिता (तदा) भ्रमों भवेत्‌ । सोध्पि न । शस्यते ॥। २५॥।

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