मुहत्तचिन्तामणि १७४ अन्वयः--पौषे पक्षत्यादिका: अओ उस हत- + बगबाहइ छल्कटरत-#ेकककाकल् पक द्वादश तिथ्य:, एवं माघादोौ द्वितीयादिकाः: ता: वक्ष्ये । [तिथ्य:], च कामात् तिख्रः तृतीयादिवत् ज्ञेया:। तत्र प्राच्यादौ याने फल ॥। एलोकक्रमेणैव सुगम: । इदं प्राच्यादौं याने क्रमेण फल ज्ञेयम् ।। २०-२३ खींचे कि खड़ी खींची हुई तेरह रेखाओं के ऊपर आड़ी चौदह रेखा ऐसी ्तर उस चक्र की जिनसे एकसौ छप्पन कोठोंवाला एक चक्र बन जावे । तदनन महीनों में सेपोष ऊपरवाली पहिली पंक्ति में पौषादि बारह महीने लिंखे। उन तिथियाँ के नीचे बारह कोठों में क्रम से परीवा से लेकर द्वादशीपरयन्त बारह हों उन्हीं लिखे और जिन कोठों में तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, ये तीन तिथियाँ लिखे । कोठों में त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूरणिमा, ये तीन तिथियाँ भी क्रम से तिथियाँ ऐसे ही माघ आदि मासों में द्वितीया से लेकर परीवा पर्यन्त बारह तीन क्रम सेऔर तृतीया आदि तीन तिथियों के कोठों में त्रयोदशी आदि तिथियों तिथियाँ क्रम से लिखे | वे सब आगे चत्र में स्पष्ट होंगी ।अब उन ।। पोष की में पूव आदि दिशाओं के यात्रा करने का फल कहते हैं ।॥ २० , पश्चिम परीवा तिथि में पूर्व दिशा को यात्रा करने में सौख्य, दक्षिण में क्लेश में शून्य फल, में भय, उत्तर में धन का लाभ होता है; द्वितीया में पूर्वदिशा मिश्रता अर्थात् दक्षिण में धन की हानि, पश्चिम में धन की हानि, उत्तर में दक्षिण में दुःख कभी हानि, कभी लाभ होता है; ततीया में पूर्व में द्रव्यक्लेश, चतुर्थी में पूर्व में पद्िचम में वाह्छित वस्तु का लाभ, उत्तर में धन होता है; होता है ॥ २१॥। लाभ, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मंगल, उत्तर में धनलाभ उत्तर में सौख्य पञ्चमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में द्रव्यलाभ, पश्चिम में धन, में मरण, उत्तर में होता है; छठि में पूर्व में भय, दक्षिण में लाभ, पर्चिम में द्रव्यलाभ, धनलाभ होता है; सप्तमी में पूर्वमें लाभ, दक्षिण में कष्ट, पश्चिम , परिचिम में उत्तर में सुख होता है; अष्टमी में पूर्व में कष्ट, दक्षिण में सौरुय दक्षिण में लाभ, क्लेश, उत्तर में सुख होता है ॥ २२ ॥ नंवमी में पूर्व में सौख्य, पूर्व में क्लेश, दक्षिण परिचम में कार्यसिद्धि, उत्तर में कष्ट होता हैं; दशमी में एकादशी में पूव में कष्ट से सिद्धि, पश्चिम में धन, उत्तर में धन होता हैऔर शून्य फल होता है; में मरण, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में मरणं, उत्तर में द्वादशी में पूर्व में शून्य फल, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में फल तृतीया आदि अत्यन्त कष्ट होता है; त्रयोदशी आदि तीन तिथियों का आदि महीनों की द्वितीया तीन तिथियों केसमान होता है और माघ आदि हैं ॥ २३ ॥। तिथियों का भी यही फल है। सो भी चक्र में स्पष्ट 'सशकामयाकाइ कक» का रूकनामक. "कक. गा डे है, 0| 3 हिणर नुनननत व ााााक बलयुक 8७६ [६७६ ४४७७७ फस.३३७७७७७५७७ नमन ४2:॥2 ४२:॥2 : बह, 8४ हि 3% 8 कह +7३३४ कि कह का 57 हाफ ४25] 9 408] > /3/ ०४ |०१५ ०।७४ |०॥७ | ०।॥2 08] 00 |०8 «7 किक | ७. कक उक- । * करकिए हुए यथाह%- #8 7 है: है ७5 कम ललित पी १39--++3७3७५. कल... -++े ३-५» ++++७क ३.७७ नननननमन-+3तनन +3++-+3+-33+3+33+++-.-अनन-न«कमथआक->५+4......3७+म+-3म सन ॥७एररणणणाणाओं ७ 4:0508 484४ «0 का +२>५ बय७ । आ७ जी औ७ ५ के [00 8 |७ ६20% [& 36७00 608 ४ 42७७] >अमम्याकक»७++»-म«-+«.--कममम. ++>->>333>.....]. 3७३ ाााााााााााााआआााणणणणणाणाा १७५ यात्राप्रकरण मुह॒त्तचिन्तामणि १७६ सर्वाड्रः योग तिथ्यक्षंवारयुतिरद्रिगजाग्नितष्टा स्थानत्रयेत्र वियति प्रथमे5तिदुःखी । मध्ये धनक्षतिरथों चरमे समृतिः स्या- त्स्थानत्रये5डुयुजि सौख्यजयो निरुक्तो ॥ २४॥
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.