काना पाक नफिभदाराताली# २४००३ केत+क+ “लग मन कन9 नकल नमक _मकनत-“ कम“ पान नन+-++नम-.3+>+न नम को नमो न--+-मने 3-4 नन-+-+>3 3 नने---+न-७-3 याम्थाअन्वयः--पन््थादिराहौ दस्रपुष्यो रगवसुजलपद्वीशमैत्राणि धर्मे स्युट, अथ ्रतिविधिजांच्रीन्द्रकर्णादितिपितृपवनोडूनि अर्थे स्युट, अथो वह्न॒चादावुध्व्यचित्र। निर्क क रक्षेणि भगारुयानि भानि कामे स्युट, अथ रोहिण्याय॑म्णाप्येन्दुविश्वान्तिम भदिन | मोक्षे स्यु:।। १८ ॥ पाँच खड़ी रेखाओं के ऊपर नौ आड़ी रेखाओं के खींचने से जो बत्तीस कोठों का चक्र होता है उसे पन्थाराहुचक्र कहते हैं । उसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ये चार मार्ग होते हैं। उन चारों में सेधर्ममार्ग में अश्विनी, पुष्य, में आइलेषा, धनिष्ठा, शतभिष, विशाखा, अनुराधा, ये सात नक्षत्र; अथंमार्ग भरणी, पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा, श्रवण, पुनर्वसु, मघा, स्वाती, ये सात नक्षत्र; काममार्ग में कृत्तिका, आर्द्री, उत्तराभाद्रपद, चित्रा, मूल, अभिजित्, पूर्वाफाल्गुनी ये सात नक्षत्र और मोक्षमार्ग में रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, मृगशिरा, उत्तराषाढ़, रेवती, हस्त, ये सात नक्षत्र स्थापन करने से यह पंथादि राहुं स्पष्ट होता है ॥॥ १८॥। ऐ जा यात्राप्रकरण १७३ पन्थाराहुचक्र आश्ले० |वि० | अनु० ?़्स् सन ++- म० | *७_-०»क«क-नथे ।स्वा०|। ज्ये० पृू० फा० | चि० मू० अनत- “++ िि---++- उ०फा० हु० पू० फा० | उ०फोा० पन्थाराहुचऋफल धर्मंगं भास्करे वित्तमोक्षे शी वित्तगे धमंमोक्षस्थिति: शस्यते । कामगे ध्मंमोक्षा्थंगः शोभनो मोक्षगे केवल धरमंग: प्रोच्यते ॥ १९॥
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