Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 18
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्ण्यकरानु राधादित्य श्रुवाणि विषमाः तिथय: सूर्येन्दुमन्दगुरवश्च अकुला: स्यु: । ज्ञ: मूलाम्बुपेशविधिभं, दशषड॒द्वितिथ्यः कुलाकुला: स्यु: । पूर्वाश्वीज्यमधेन्दुकर्णदहनद्वीशन्द्रचित्रा: तथा शुक्रारौ अर्काष्टेन्द्रवेदेमिता: तिथय: कुलसंज्ञका: स्यू । अकुले समरे यायी जयी स्यात्‌। तद्गत्‌ कुले स्थायी जयी स्यात्‌ । कुलाकुलगणे, यूध्यतो: उभयो: भूमीशयो: सन्धि: स्थात्‌ ॥ १६-१७ ॥। स्वाती, भरणी, इलेषा, धनिष्ठा, रेवती, हस्त, अनुराधा, पुनर्वंसु, रोहिणी, १७२ मुह॒ृत्तचिन्तामणि तीनों उत्तरा, ये बारह नक्षत्र, और परीवा, तीज, पंचमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, त्रयोदशी, पूर्णमासी, अमावास्था सोमवार, यथ तिथियाँ और रविवार, यह एक शनैदचर, बृहस्पति ये दिन अकुलसंज्ञक तथा बुधवार र और दशमी, दिन और मूल, शतभिष, आर्द्रों, अभिजित्‌ ये चार नक्षत् पूर्वा, अश्विनी, छठि, दुइज ये तिथियाँ कुलाकुलसंज्ञक ॥ १६॥ तथा तीनों चित्रा, ये बारह पुष्य, मघा, मृगशिरा, श्रवण, कृत्तिका, विशाखा, ज्येष्ठा, चतुर्देशी, चौथि, नक्षत्र और शुक्र, मंगल ये दो दिन और द्वादशी, अष्टमी, रों में यात्रा या ये चार तिथियाँ कुलसंज्ञक हैं। अकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत् , वार नक्षत्रों युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला यायी राजा, और कुलसंज्ञक तिथि यी होता है, और में युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला स्थायी राजा युद्ध में विज स्थायी दोनों कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों मेंयुद्ध करनेवाले यायी, राजाओं में सन्धि हो जाती है ॥ १७॥। पन्थाराहु का विचार स्युद्धंम दस्रपुष्यो रगवसुजलपदीझमैत्राण्यथार्थे भानो ि कामे । याम्याजाड त्रीस्द्रकर्णादितिपितृपवनोड्न्यथ बहुचार्दावुध््यचित्रानिऋतिविधिभगार्यानि मोक्षे थरोहिप्नार्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिम भदिनकरक्षाणि पन्‍्थादिराहौ ॥ १८॥

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