तीक्ष्णाख्ये: न अन्वयः--पूर्वाह्ले ध्ुवमिश्रभे: नृपते: यात्रा न शुभा, मंध्याह्कके उग्रेः मध्यरात्रिसमये शुभा, अपराह्लके लघुभे: न, तथा मित्राख्य: पू्रात्रे न,तथा च सबेकाले नृपतेः यात्रा न, तथा चरी: राल्यन्ते न (शुभा भवति) । हरिहस्तपुष्यशशि्षि: शुभा स्यात् ॥ ११॥ विशाखा दिन के तीन भाग करके पहिले भाग में तीनों उत्तरा, रोहिणी, ा में; तीसरे और कृत्तिका में; दूसरे भाग में मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रोःऔर इलेष प्ज- ब.++-जब-+ ५0०० यात्राप्रकरण १६९ भाग में अश्विन्नी और अभिजित् में यात्रा न करे। ऐसे हीं रात्रि के तीन भाग करके पहिले भाग में रेवती, चित्रा और अनुराधा में; दूसरे भाग में तीनों पूर्वा, भरणी और मधघा में और तीसरे भाग में स्वाती, पुनर्वंसु, धनिष्ठा और शतभिष में यात्रा न करनी चाहिए। श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशिरा, इन नक्षत्रों में सब काल में यात्रा शुभ होती है ॥। ११॥ यात्रा में मध्यम नक्षत्र तथा कई निषिद्ध नक्षत्रों की त्याज्य घटी पूर्वाग्निपिन््यान्तकतारकाणां भूपप्रकृत्युग्रतुरड्भरमाः स्थुः॥ स्वातीविज्ञाखेद्धभुजड्भमानां नाड्यों निषिद्धा सनुसंभिताश्च ॥ १२॥
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.