Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 99
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

दल वृष मिथुन फर्क आग्नेय गोधूलिप्रशंसा नास्यामृक्ष न तिथिकरणं नव लग्नस्थ चिन्ता तो वारो न च लवविधिनों मुह॒त्तंस्थ चर्चा। नो वा योगो न मृतिभवनं नव जामिन्नदोषों गोधूलिः सा मुनिभिरुदिता सर्वकार्येषु शस्ता ॥ ९९॥ अन्वयः--अस्यां (गोधूल्यां) ऋक्ष न (चिन्त्यं) तिथिकरणं न, लग्नस्य चिन्ता नेव, गा बार: न, च लग्नविधिः न, भुहतंस्य' चर्चा नो, नो वा योगः, मृतिभवनं नैव, जामित्न- दोष: नव, (यतः) सा गोधूलिः मुनिभिः स्वंकार्येषु शस्ता उदिता ॥ && |। सम्पूर्ण कार्यों मेंगोधूलि को मुनियों नेऐसी शुभ कही है कि इसमें नक्षत्र, तिथि, करण, वार नवांशविधान, योग, आठवें स्थात्त की शुद्धि, जामित्रदोष ये सब विशेष नहीं बिचारे जाते । लग्न का भी विशेष विचार नहीं किया जाता, और मुहत्त को तो कुछ चर्चा ही नहीं है। इस इलोक का तात्पर्य यह है कि बहुत से सुयोगों केरहते कोई एक कुयोग भी हो तो गोधूलि में विवाह शुभ होता है। अथवा अन्य समय के लग्न में सब सुयोग ही हों और गोधूलि की लग्न में कुछ दोष भी हो तो ग़ोधूलि ही श्रेष्ठ होती १५२ महसेचित्तामाण है । अथवा पूर्व देशों में तथा कलिंग देश में गोधूलि मुख्य होती है। अथवा गांधवेविवाह तथा वैश्य आदि के विवाह में गोधूलि श्रेष्ठ है। अथवा कोई शुभ लग्न न होऔर कन्या युवती हो गई हो तो विधवा आदि भारी दोषों _ को छोड़कर गोधूलिं में विवाह श्रेष्ठ होतत है ॥ ९९॥

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