Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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अन्वयः--विद्गुरुसितेषु केन्द्रकोणे (स्थितेषु) इह अब्दायनर्तृतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिरांगमुखा: दोषा: नश्यन्ति च पुनः तद्वत् पापविधुयुक्तनवांशदोष: ह नश्यति ॥ ८४ ।। लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बुध, बृहस्पति और शुक्र के रहते सम-विषमादि वर्षदोष, अयनदोष, ऋतुदोष, रिक्तादि तिथिदोष, मासदोष, ऋरग्रहसहितादि नक्षत्रदोष, तेरह दिन का पक्षदोष, दग्धातिथिदोष अन्ध-काण-बधिरादि लग्नदोष और अकालवृष्टिट आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही चन्द्रयुक्त राशि के नवांश में पापग्रह के रहने का भी दोष नष्ट हो जाता है ॥ ८९१ अन्य दोषों का परिहार केन्द्रे कोणे जीव आये रवौ वां लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमे वा । सर्घे दोषा नाशमायान्ति चन्द्रे लाभे तदृददुमुंह॒र्तांशदोषाः ॥ ९०॥
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