अन्वय+--कतंरिका रकौ पापौ (यदि) रिपुगृहे (वा) नीचास्तगो (तदा) कतंरी- दोषो नैव (भवति), अरिनीचगुहंगे सिते तत्षष्ठदोष: अपि न (भवेत्), भौमे अस्ते रिपुनीचगे अष्टमों भौमः दोषकृत् नहि भव्रेतू, शशिनि नीचे नीचनवांशके (स्थिते) रिष्फाष्टारिदोष: अपि न भवेत् ।। ८८ ।। यदि कत॑री कारक दोनों ग्रह क्रर हों, अथवा अपने शत्रु के स्थान में स्थित हों या अपने नीच स्थान में हों, अथवा अस्त हों तो कतंरी दोष नहीं होता । यदि छुक्र अपने शत्रु के स्थान में या नीच स्थान में स्थित हो तो लग्न से छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता । यदि मंगलःअपने शत्रु के स्थान जज सिीयिसिसिशभीअभश/श शक ककककककककककककककी ककक्ककककीकि िकीककीककीकीकेक कु भभघभघभघभघभघफझझफै्््््््््््ऊ्ऱ १४७ विवाहप्रकरण न में यानीच स्थान में स्थित हो अथवा अस्त हो, तो लग्न से आठवें स्थान में रहकर भी दोषकारक नहीं होता । यदि चन्द्रमा अपने नीच स्थान में या नीच राशि के नवांश में स्थित हो तो लग्न से बारहवें, आठवें, छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता ॥| ८८ ॥। वर्ष आदि अनेक दोषों का परिहार अब्दायनतृतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिरा ड्भमुखाइच दोषाः । नदयन्ति विद्गुरुसितेष्विह केन्द्रकोणे तद्रच्च पापविधुयुक्तनवांशदोषः ॥ ८९ ॥
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