। अन्वयः--शनिः व्यये, अवनिज: खे, भगृ: तृतीये, चन्द्रखला: तनों न शस्ता: । लग्नेट् कवि:, ग्लौं: रिपौ, च ग्लौ: लग्नेट शुभारा: मृतो, च (तथा) सर्वे [ग्रहा:] मदे [न शस्ताः स्यू: |॥| ८६॥ विवाहकालिक लग्न से बारहबें स्थान में शनेइचर, दशरवें स्थान में मंगल, तीसरे स्थान में शुक्र और लग्न में चन्द्रमा तथा पापग्रह शुभ नहीं होते । छठे कक] *अभीष्ट राशि में उसी का नवांश वर्गोत्तम कहा जाता है । यथा मेष राशि में मेष का नवांश, बृष राशि में वष का नवांश । १४६ मुहत्तंचिन्तामणि स्थान में लग्नेश, शुक्र और चन्द्रमा शुभ नहीं होते । आठवें स्थान में चन्द्रमा, लग्नेश, शुभग्रह और मंगल शुभ नहीं होते । और सातवें स्थान में सम्पूर्ण शुभाशुभ ग्रह शुभ नहीं होते ।| ८५६ ।। विधवाहकालिक शभग्रह त्यायाष्टघट्सु रविकेतुतमो5क पुत्रा- के हवा ८०७७ लक प काके +-->-->>-१५७३....आक >%-क-3+-०-.आभ. कपाकसक ण स्ज्यायारिग: छ्ितिसुतो द्विगुणायगोंडब्ज: । सप्तव्ययाष्टरहितो ज्ञगुरू सितोष्टत्रिद्यनघटव्ययग॒हान्परिहृत्य शस्तः ॥ ८७१ अन्वयः--ल्यायाष्टपट्सू रविकेतुतमो5कंपुत्रा: (शस्ताः स्यू:) । क्षितिसुतः त्यायारिग:, अब्ज: द्विगुणायग: (शुभः) । ज्ञग्रू सप्तव्ययाष्टरहितो (शुभो), अष्टत्रिद्युनषडव्ययगृहान् परिहत्य सितः शस्त: (स्यात्) ।। ८७ ॥।
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