Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 82
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्बयः--घस्रे [दिने] तुलाली बधिरो [भवेताम्‌ |, रात्रौ मृगाश्वो वधिरौ #एक राशि से दूसरी राशि में ग्रहों केजाने को संक्रान्ति कहते हैं । १४४ मुहत्तचिन्तामणि (स्याताम्‌), च (तथा) सिहाजवृषा: दिवान्धा:, कन्यान्युक्क्रकटका: निशानन्‍्धा: जी (भवन्ति), दिने घट:, निशि अन्त्य: पंगुसंज्ञ: स्थात्‌ ॥| ८५१॥। तुला और वृहद्चिक ये दोनों लग्नें दिन में तथा मकर और धनु रात्रि में बहिरी होती हैं। सिह, मेष और वृष दिन में तथा कन्या, मिथुन और कर्क रात्रि में अन्धी होती हैं । कुम्भ लग्न दिन में तथा मीन लग्न रात्रि में पंगु होती हैं ।| ८१ ॥। *सतान्‍्तर से पंगु आदि दोष बधिरा धन्वितुलालयो5पराह्ले मिथुनं ककंटकोड्रना निशान्धा: । दिवसान्धा हरिगोक्रियास्तु कुब्जा मृगकुम्भान्तिम भानि सन्ध्ययोहि ॥। ८२ ॥ अन्वय:--धन्वितुलालय: अपराह्लु बधिराः (स्यु:) मिथुनं ककेकट: अंगना (एत्ते) निशान्धा:, हरिगोक्रिया: दिवसान्धा: हि कुब्जा: (भवन्ति) ॥ ८२ ॥

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