Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 80
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

विषुव अर्थात्‌ तुला और मेष, अयन अर्थात्‌ कर्क और मकर की संक्रान्ति जिस दिन हो वह दिन और उससे एक दिन आगे और पीछे, इन तीन दिनों में विवाहादि शुभ कार्य न करे । अन्य संक्रान्तियों में जिस समय संक्रान्ति हो उससे पहिले सोलह दण्ड और पीछे सोलह दण्ड त्याग दे अर्थात्‌ इन बत्तीस दण्डों में विवाहादि शुभ कायें न करे ॥| ७९ ।| सूर्यादि ग्रहों की संक्रान्तियों में निषिद्धकाल देवहंच ड्रतंवो5ष्टाष्टो नाड्यो5ड्रूगः खन्‌पाः क्रमात्‌ । वर्ज्या: संक्रमणे3र्कादे: प्रायो5क॑ स्पातिनिन्दिता: ॥| ८० ॥। अन्वयः--अर्कादे: संक्रमणे क्रमात्‌ देवद्चंकतंव: अष्टाष्टो अंका: खनपा: नाड्च: वर्ज्या: । अकंस्य प्रायः अतिनिन्दिता: (भवन्ति ) ।| ८० ।। संक्रान्ति* काल से पूर्व और पर मिलाकर तेंतिस दण्ड सूर्य की संक्रान्ति में, तो दण्ड चन्द्रमा की संक्रान्ति में, नवदण्ड मंगल की संक्रान्ति में, छः दण्ड बुध की संक्रान्ति में, अट्ठासी दण्ड बृहस्पति की संक्रान्ति में, नव दण्ड शुक्र की संक्रान्ति में और एक सौ साठ दण्ड शनहचर की संक्रान्ति में निषिद्ध होते हैं, इसलिए विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागने के योग्य हैं । किन्तु इनमें सूर्य की संक्रान्तिवाले तेंतिस दण्ड अति अशुभ होते हैं | ८० ॥

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