। लवडूनपों5शं द्युनं लग्नपो5स्त॑ सिथो वेक्षते स्याच्छुूभं कनन््यकाया: प्रपश्येत् (तदा) अन्वयः--लवेश: लवं, (तथा) लग्नयः लग्लगेहूं वामिथः (यदि ) मिथ: ईक्षते (तदा) कन्यकाया: वरस्य शुभ स्थात्। लवद्यूनपः अंश द्युनं लग्नवः अस्त वा श्भ स्यथात् ॥ ७७ |। को देखता हो नवांश का स्वामी नवांश को और लग्न का स्वांमी लग्न लग्न कोऔर लग्न अथवा दोनों परस्पर देखते हों, अर्थात् -नवांश का स्वामी और यदि लग्न के का स्वामी नवांश को देखता हो तो वर का शुभ होता है को और नवांश से सातवें नवांश का स्वामी लग्न से सातवें भाव के नवांश हो अथवा लग्न से सातवें भाव का स्वामी लग्न से सातवें भाव को देखता और भाव का दोनों परस्पर देखते हों, अर्थात् नवांश का स्वामी भाव को | ७७ ।। स्वामी नवांश को देखता हो तो कन्या का शुभ होता है अन्य प्रकार से लग्न और सातवें भाव की शुद्धि लवपतिशुभमित्र वीक्षतें$शं तनुं वा परिणयनकरस्य॒स्याच्छुभ शास्त्रदुष्टम् । मदनलवपमित्र॑ सौम्यमंशं झुनं वा तनुमदनगृहं चेद्दीक्षी शर्म वंध्वा ॥ ७८॥ अन्वयः--लवपतिशुभमित्रं अंश तनूं वा यदि वीक्षते तदा परिणयनकरस्य शास्त्रदुष्टं [तदा ] शुभ स्यात् । सौम्यं मदनलवपमित्न चेत अंश द्यूनं वा तनुमदनगुहं वीक्षते चेत् वध्वाः शर्म [शुभं |स्थात् ।। ७८।। लग्न के नवांश के स्वामी का मित्र होकर शुभग्रह, यदि नवांश को या लग्न को देंखता हो तो बर को शुभ होता है और लग्न के नवांश से सातवें दी जल की... सडक लक -औट के _अक कु क। क्रम ७७७ ३225 नन्-जल्ओ नल >> कु ननलुलक कक मीलशकी 2.3. “+. विवाहप्रकरण १४२ नवांश के स्वामी का मित्रहोकर शुभग्रह यदि लग्न से सातवें भाव के नवांश को या सातवें भाव को देखता हो तो स्त्री को शुभ होता है। ऐसा शास्त्र में कहा और देखा गया है ॥| ७८ ॥। सूर्य-संक्रान्ति में निषिद्धकाल विषुवायनेषु परपूर्वमध्यमान्ू._ दिवसांस्त्यजेदितरसंक्रमेष हि। घटिकास्तु षघोडशशु भक्रियाविधौ परतोषि पूर्वमपि सन्त्यजेदबुधः ॥ ७९॥ अन्वयः--विषुवायनेष् [संक्रान्तिषु | (क्रमेण) परपूर्वमध्यमान् दिवसान्' त्यजेत् । इतरसंक्रमेष हि परत: पूर्व अपि षोडश घटिका: शुभक्रियाविधो बुध: त्यजेत् ॥ ७८ ॥
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