Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 68
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--लग्नात्‌ (वा) चन्द्रात्‌ मदनभवनगे किवा बाणाशुगमितलवगे खेटे (सति) जामित्न स्थात्‌, इह परिणयन न स्यात्‌, इद् अशुभकरं स्यात्‌ ।। ६७ ॥। विवाह की लग्न से अथवा चन्द्रमा से सातवें स्थान में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो जामित्र दोष होता है। जामित्र दोष में विवाह न करना चाहिए । लग्न और चन्द्रमा जिस नवांश में हो उससे पचपनतवें नवांश में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो, और कोई ग्रह जिस नवांश में स्थित हो उससे पचपनवें नवांश में यदि लग्न या चन्द्रमा होतों भी जामित्र दोष होता मुह॒ृत्तंचिन्तामणि १३६ है । यह जामित्र दोष विवाहादि शुभ कार्यों में अति अशुभकारक होता है ।। ६७ ।॥। एकार्ग लादि दोषों का परिहार एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्रकतंयुंदयास्तदोषाः । नदयन्ति चन्द्राकं बलोपपन्ने लग्ने यथार्काम्युदये तुदोषा । ६८॥। अन्वयंः-चन्द्राकंबलोपपन्ने लग्ने [सति] एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्नकर्तेर्युदयास्त- -न-ननननन-+--3-4++>-मन ७» ०--+-3-जपी कस. : >+%.. की “४+5५०+-+--+७«» «*----७-२०७.-२.७ ८-७७ ७३०७-०० ॑न-अक-कना+मकाक >+ दोषा: नश्यन्ति; यथा अर्काभ्युदये दोषा (रात्रि: नश्यति) ।। ६८ ।। यदि विवाह लग्न सूर्य-चन्द्रंमा के स्वोच्चादि-स्थान-स्थितिरूप बल से युक्त हो तो एका्गल, उपग्रह, पात, लत्ता, जामित्र, कर्तरी, उदयास्तदोष, ये सब नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य केउदय होते ही रात्रि नष्ट हो जाती है ॥ ६८॥ देशभेद से उक्त दोषों का परिहार उपग्रह कुरुबाह्लिकेषु कलिगबंगेषु च॑ पातित॑ भम्‌ । _ सौराष्ट्शाल्वेषु च लत्तितं भ॑ त्यजेत्तु विद्धं किल संदेश ॥ ६९ ७ सौराष्ट्रअन्वयः--कुरुबाह्िकेषु [देशेषु |उपग्रहक्ष, च कलिज्भूबज्भेषु पातितं भं, च शाल्वेष लत्तितं भ॑ त्यजेत्‌, विद्धं भंतुसवंदेशे किल (निश्चयेन ) त्यजेत्‌ ॥ ६८ ॥

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