Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 66
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

। अन्वयः--रवे: [सकाशात्‌ क्रमेण ]शक्राकंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विन: तिथ्यंशाः |मुहूर्त्ता: | ें:) कुलिका: स्युः (ते) निरेका: राबौ कुलिका: (ज्ञेया:) च शनो अन्त्येष्पि (मुहत्त निन्दितः स्यात्‌ ॥। ६५ | क्‍ । | | ।द | | द क्‍ सूर्यादि वारों में१४। १२९। १० । ५। ६। ४। २ ये मुहूत्ते कुलिक संज्ञक होते हैं, अर्थात्‌ दिनमान में पन्द्रह का भाग देने सेजो दण्डपल लब्ध हों उनको मुह॒त्ते कहते हैं । ऐसे पन्द्रह मुहत्त एक दिन में होते हैं। उनमें रविवार को चौदहवाँ, सोमवार को बारहवाँ, मंगल को दशवाँ, बुध को आठवाँ, बृहस्पति को छठा, शुक्र को चौथा, शने₹चर॑ को दूसरा मुहत्ते कुलिक- संज्ञ़क होता है। यही सब मुह॒त्त एक हीन होकर इन्हीं दिनों की रात्रि में कुलिक होते हैं अर्थात्‌ रविवार की रात्रि में तेरहवाँ, सोमवार की रात्रि में गेरहवाँ, मंगलवार की रात्रि में नवाँ, बुध की रात्रि में सातवाँ, बृहस्पति की | | रात्रि में पाँचवाँ, शुक्र की रात्रि में तीसरा, शनैइचर की रात्रि में पहिला तथा पन्‍्द्रहवाँ भी मुहृत्त कुलिकसंज्ञक होता है। ये मुहूत्ते विवाहादि शुभ कार्यों में | अशुभ होते हैं । ६५ ।। 5 |क्‍ | द दग्धातिथि_ चापान्त्यगे गोघटगे पतड़ कर्काजगे स्त्रीमिथुने स्थिते च । सिहालिग नक्रधटे समाः स्युस्तिथ्यो द्वितोयाप्रमुखाइच दग्धा: ॥ ६६॥ अन्वयः--चापान्त्यगे, गोघटगे, कर्काजगे, स्त्नीमिथुने स्थिते च सिहालिगे नक्रधटे, पतंगे [सूर्य |सति (क्रमेण) द्वितीयाप्रमुखा: समाः तिथ्यः दरधा: (भवन्ति) ॥ ६६॥

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse