॥। अन्वयः--पातोपग्रहलत्तासु खेटपत्समः अंधिि: नेष्ट: स्यात्। (अथ ) वार: त्विध्नः अष्टनि: तष्ट: संक: अद्धंयामकः स्यात् ॥| ६४ ।। पात, उपग्रह और जत्ता दोष में दोषकारक ग्रह जिस नक्षत्र केजिस चरण में स्थित हो उस नक्षत्र कावही चरण अशुभ होता है अर्थात् पात और उपग्रह में तो जिस नक्षत्र केजिस चरण में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से पाँचवें आदि चन्द्रमा के नक्षत्र कावही चरण दृषित होता है। और लत्ता दोष में लत्ताकारक ग्रह, नक्षत्र चन्द्रमा के नक्षत्र केजिस चरण में स्थित होते हैं का वही चरण दोषी होता है, सम्पूर्ण नक्षत्र दोषी नहीं होता । अब अद्धयाम दोष कहते हैं। दिनमान में आठ का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों, उनको अद्धंयाम कहते हैं। ऐसे आठ अद्धंयाम एक दिन में होते हैं। उनमें एक अशुभ होता है। उसके जानने की यह रीति है कि जिस दिन उस अल्युभ अद्धंयाम को जानना हो, रविवार से उस दिन तक मुहत्तचिन्तामणि १३४ देने से गिनने से जितनी संख्या हो उसे तीन से गुणा करके आठ का भाग संख्याजो बाकी बचे उसमें एक और मिलाने से जितनी संख्या हो उतनी वाला अद्धंयाम अशुभ होता है। उदाहरण-झनयथा रविवार से मंगलवार का तक की तीन संख्या को तीन से गुणा किया तो नव हुए । उसमें आठ । भाग दिया तो एक शेष रहा । उसमें एक और मिलाने पर दो हुए इससे ज्ञात हुआ कि मंगलवार का दूसरा अद्धयाम अशुभ होता है । ऐसे ही अन्य दिनों में भीजानना चाहिए, सो चत्र में मैंने स्पष्ट कर दिया है ।। ६४ |।
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