Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 63
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi

च्त८७.4 पे केक *-जन कं 8433-30. ०-९७ +२... की.##.. +3+ ) विरुद्ध अन्वयः--व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशलान्त्येवंओ परिधातिगण्डे (अस्मिन्‌ (तदा) खार्जूरं योगे चेत्‌ (यदि) अभिजित्समेतः शश्ञी « अर्कात्‌ विषमे (स्थितः) स्यात्‌ ॥| ६२ ॥। जिस दिन व्याघात, गंड, व्यतीपात, -विष्कुम्भ,- शूल, वंधृति, वज्ञ, कोई योग हो और जिस नक्षत्र में सूर्य परिघ, अतिगंड इन योगों में से दिन स्थित हो उस नक्षत्र सेलेकर विषम नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित हो उस का भी खार्जूर दोष होता है । यहाँ सम-विषम की गणना में अभिजितू है। उदाहरण-ग्रहण है । यह योग विवाहादि शुभ कार्यों में निन्दित होता सूय यथा द्वादशी, रविवार और मूल नक्षत्र व्याघात: योग है,. और विवाहप्रकरण उत्तराषाढ़ में है,इसलिए उत्तराषाढ़ १३३ सेआभिजित्सहित मूल नक्षत्र तक सत्ताइस हुए । यहाँ सूर्य से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में हैं, इसलिए एकार्गेल दोष है। इस दिंन विवाह करना अच्छा महीं है। इस दोष को एकार्गल भी कहते हैं | ६२ ।। उपग्रह दोष दराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यस्तिथिध तिशच॒प्रकृतेश्च पतन्च । उपग्रहाः सूयभतोडब्जताराः शुभा न देदों कुरुबाह्लिकानाम्‌ ॥ ६३ ॥

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