Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 33
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

११ढ मुहत्तचिन्तामणि हार दुष्ट गणकट, भक्ूट और ग्रहकूट का परि ाद्गणानां न दोष: । सेत्रयां राशिस्वामिनोरंशनाथदन्द्स्थापि स्थ ्ट भक्टृठम ॥ ३३४ दुष षि ्चा ीतज प्र खेट ूट ्धक ्स: येत नाश बेटारित्वं नां वा अंशनाथदन्द्वस्य मैत्यां सत्यां गणा अन्वयः--राशिस्वामिनो: मैत्यां, अपि ्रीतिः अपि दुष्टं भकूट ताशयेत्‌ । तथा खेटप दोष: न स्यात्‌। सड्भकूर्ट खेटारित्वं नाशयेत्‌ ॥ ३३ | े न्मराशि के स्वामी की, तथा कन्याकन्याजन्मराशि के स्वामी और वरज के नवांश के स्वामी की ि राश न्म वरज और ामी स्व के ंश जन्मराशि के नवा और यदि सड्भूकूट हो अर्थात्‌ ा, होत ं नही ष दो गण तो हो ा परस्पर मित्रत अथवा वरजन्मराशि से कन्या की शि मरा जन् की वर से ि राश कन्याजन्म ी या सातवीं हो तो कन्याजन्मचौथ ीं, दशव री, तीस ं, हवी गेर शि जन्मरा यदि कन्या- ा का नाश कर देता है। राशीश और वरजन्मराशीश की शत्रुत मित्रता हो तो वह पूर्वोक्त ्पर परस की ीश राश न्म वरज जन्मराशीश और षट्काष्टकादि दुष्ट भकूट का नाश करती है ॥ ३३ ॥

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