Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 32
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

पूर्व कहे हुए षट्काष्टकादि दुष्ट भकूट के रहते भी यदि कन्या-जन्मराशि और वर-जन्मराशि का स्वामी एक ही हो अथवा उन दोनों की परस्पर भकूट मित्रता हो और नाड़ी शुद्ध हो तो विवाह शुभ होता है। अथवा दुष्ट के रहते और जन्मराशीशों की परस्पर शत्रुता या समता के भी रहते यदि नाड़ी शुद्ध होऔर जन्म-राशियों के नवांशों के स्वामी परस्पर मित्र या बली हों तो भी विवाह शुभ होता है। अथवा इन दोषों के रहते भी यदि अथवा नाड़ी शुद्ध होऔर तारा शुद्ध हो तो भी विवाह शुभ होता है। हो पूर्वोक्त सब दोषों के रहते और तारादोष के भी रहते यदि नाड़ी शुद्ध और 'हित्वा मृगेन्द्रं नरराशिवश्या' इस इलोक में कही हुई रीति से कन्याजन्मराशि के वश में वर जन्मराशि न हो तो भी विवाह शुभ होता है। परन्तु नाड़ी के शुद्ध न रहते विवाह न करना चाहिए, ऐसा पण्डितलोग कहते हैं ।। ३२ ।।

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