अन्वयः--सुतपरिणयात् षण्मासान्त: सुताकरपीडनं न, च तद्गवत् निजकुले मण्डनात् मुण्डनं आप न, च(तथा) सहजयो: भ्रात्रो: सहोदरकन्यके न देये, अब्दार्ध सहजसुतोद्वाह: न, तथा शूभे पित॒क्रिया न (कार्या) !। १६॥ एक कुल में किसी लड़के के विवाह के बाद छ: महीने के भीतर किसी लड़की का विवाह और किसी लड़के या लड़की के विवाह के बाद छः महीने के भीतर किसी का मुण्डन न कराना चाहिए, अर्थात् लड़की के विवाह के बाद लड़के का विवाह और मुण्डन के बाद विवाह कराना चाहिए । सगे दो भाइयों केसाथ सगी दो बहनों का विवाह, छः महीने के भीतर ही सगे मुह॒त्तचिन्तामणि १०६ दो भाइयों का विवाह, छः महीने के भीतर सगी दो बहिनों का विवाह नहीं कराना चाहिए अर्थात् सौतेले भाइयों और सौतेली बहिनों का करा सकते हैं । विवाहादि शुभ कार्यों में पितृश्नाद्धाद न करना चाहिए, अर्थात् ऐसे समय में विवाह आदि की लग्त ठीक करना चाहिए कि जिसमें श्राद्ध का दिन न पड़े ॥ १६|| विपत्ति में विवाह का विचार वध्वा वरस्यापि कुले त्रिपुरुषे नाशं ब्रजेत् करचन नि३चयोत्तरम् मासोत्तरं तत्र विवाह इष्यते शान्त्याथवा सुतकनिगंसे परेः ॥ १७॥
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.